बिलसंडा (पीलीभीत)। तहसीलदार का पद ठुकरा कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कुंवर भगवान सिंह बागी हो गए थे। पूरे जिले में आंदोलन का बिगुल फूंका था। इसलिए आज भी लोग उनका नाम बड़े सम्मान के साथ लेते हैं। जमींदार परिवार के कुंवर भगवान सिंह की खंडहर हो चुकी हवेली गांव में आज भी आजादी के दिनों की याद दिलाती है।
बिलसंडा से चार किलोमीटर दूर गांव बमरौली के जमींदार परिवार में 12 अप्रैल 1908 को कुंवर भगवान सिंह जन्म हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद सीधे तहसीलदार के पद पर नियुक्ति किए गए लेकिन महात्मा गांधी को सुनने के बाद देशभक्ति का जुनून जाग गया। सरकारी ओहदे को ठुकरा कर विद्रोह का रास्ता चुन लिया। कुंवर भगवान सिंह के पितामह (पिता के पिता) ठाकुर हीरा सिंह 1857 के गदर में हिस्सेदारी करके तीन साल तक स्वतंत्र रूप से तहसील बीसलपुर पर राज करते रहे। चाचा मेहताब सिंह ने 1916 में लखनऊ में कांग्रेस संगठन के लिए काम किया था। बड़े भाई ठाकुर शंकर सिंह असहयोग आंदोलन में शामिल हुए थे। इसी क्रांतिकारी विरासत को भगवान सिंह ने आगे बढ़ाया। संघर्षरत रहे, आंदोलन के लिए नौजवानों की फौज तैयार की। संवाद
जेल में हुई थी क्रांतिकारियों से मुलाकात
कुंवर भगवान सिंह ने जिले में जंगल सत्याग्रह छेड़ा। युवाओं को सत्याग्रह के लिए तैयार करते थे। क्रांति के गीत गाते हुए जुलूस निकालते थे। आंदोलन के दौरान उन्हें पूरनपुर में पकड़ लिया गया था लेकिन जिस गाड़ी से उनको लाया जा रहा था। उसको सत्याग्रह कर रहे लोगों ने खराब कर दिया गया, तब दूसरे दिन ट्रेन से लाया गया। उन्हें 15 सितंबर 1930 को छ: महीने की सजा सुनाई गई। उनके बड़े भाई पहले से ही जेल में थे। दोनों को फैजाबाद भेज दिया गया, जहां उनकी मुलाकात बरेली के सेठ दामोदर स्वरूप से हुई। सभी बंदी मार्च 1931 को गांधी इरविन समझौता होने पर छोड़ दिए गए। इसके बाद 4 जनवरी 1932 को कांग्रेस ने फिर सत्याग्रह की घोषणा कर दी। इस आंदोलन में 350 आजादी के दीवानों के साथ उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। 25 जनवरी को पांच महीने की सजा फिर सुनाई गई।
बीसलपुर के पहले विधायक चुने गए
वर्ष 1937 में हुए प्रथम विधान सभा चुनाव में जिले में कुल दो सीटें थीं। पहली सीट बीसलपुर से कुंवर भगवान सिंह और दूसरी पीलीभीत-पूरनपुर सीट से पंडित रामेश्वर दयाल वैद्य चुनाव लड़े और विजयी हुए। जब 11 अक्तूबर 1940 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह करने का प्रस्ताव पारित किया। तब इन्होंने सत्याग्रह शुरू करा दिया। इसके बाद 10 दिसंबर 1940 को उन्हें एक साल की सजा देकर बरेली जेल भेज दिया गया। जेल में भगवान सिंह ने जो अपनी डायरी लिखी, उसमे लिखा था कि इस गुलाम मुल्क हिंदुस्तान में जुबान बंद करके रहना मृत्यु के समान है। जेल से छूटने के बाद कुंवर भगवान सिंह पुन: विधान सभा सदस्य चुने गए।
स्रोत: सुधीर विद्यार्थी की पुस्तक अपराजेय योद्धा कुंवर भगवान सिंह
बमरोली में कुंवर भगवान सिंह की हलेवी का मुख्य द्वार देखरेख न होने की वजह से टूट गया।- फोटो : PILIBHIT