मोहनलाल आचार्य के लिए राजनीति सेवा थी। जब तक वह राजनीति में रहे उन्होंने केवल लोगों का दर्द सुना और उसे पूरा करने में दिन-रात जुटे रहे। न घर की फिक्र न किसी वैभव की। अपने बच्चों को भी उन्होंने यही सीख दी कि जो भी करना खुद करना। उन्होंने कभी पद का दुरुपयोग नहीं किया। इसकी झलक उनके बेटों को देखकर जानी जा सकती है। एक बेटा याज्ञवेंद्र किसान चीनी मिल में ईमानदारी से काम कर रहा है और दूसरा बेटा ऋषि आचार्य ड्राइवरी कर अपने परिवार की जीविका चलाता है। क्षेत्र के पहले विधायक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहन लाल आचार्य का सियासत में बेहद रुतबा और दबदबा था। उस वक्त वह कई मामले पंचायतों में ही निपटा देते थे। लेकिन आज की तरह कुनबे की कड़ियां बढ़ाने के वह पक्षधर नहीं थे। बदायूं के उझानी के गांव संजरपुर में पांच सितंबर 1914 को हुलासीराम के घर जन्मे मोहन लाल आचार्य की मां का छह माह की उम्र में निधन हो गया था। उनके पिता की विधवा बहन मुन्नी देवी नगर में रहती थीं। उनके कोई संतान नहीं थी। मोहन लाल का पालन पोषण उन्हीं ने किया था। आठवें तक पढ़ाई की। देश की आजादी में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। 17 वर्ष की आयु में आठ मार्च 1932 को कांग्रेस अधिवेशन मेें उनकी गिरफ्तारी हुई। चार माह की सजा और सौ रुपये का जुर्माना। दंड न देने पर एक माह का अतिरिक्त कारावास झेलना पड़ा था। इसके बाद मेें 1941 में नौ माह, 1942 में तीन साल जेल में रहे। स्वतंत्रता सेनानी मोहन लाल आचार्य 1962 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी से विधायक बने थे। अगले चुनाव में 1967 में दुबारा विधायक चुने गए। उनकी प्रेरणा से तमाम लोग राजनीति मेें आए, लेकिन उनके विरासत संभालने को उनके परिवार में कोई राजनीति नहीं करता। उनका दबदबा आज भी लोग याद करते हैं।
आज भी लगी है विधायक की नेम प्लेट
पूरनपुर। पहले विधायक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहन लाल आचार्य के घर के बरामदें में आज भी विधायक की नेम प्लेट लगी है।
किसी परिजन को नहीं मिला लाभ
पूरनपुर। पूर्व विधायक मोहन लाल आचार्य की पांच संतानों में सबसे बड़े पुत्र याज्ञवेंद्र, इससे छोटे राघवेंद्र, ऋषि आचार्य, बेटी दयंती, राजकुमारी हैं। इसमें से राघवेंद्र की कई साल पहले बीमारी से और राजकुमारी की भी मौत हो चुकी है।