पीलीभीत। जंगल के सिकुड़ते दायरे पर किसी का कोई ध्यान नहीं है, न ही टाइगर रिजर्व में संसाधनों की पर्याप्त आपूर्ति की जा रही है। अगर आगे भी यह सब कु छ ऐसे ही चला तो एक दिन बाघों और अन्य वन्यजीवों के कुनबे के सामने समस्या खड़ी हो जाएगी। अमरिया में डेढ़ साल से 10 बाघों का लगातार आबादी में घूमना इसी बात की ओर संकेत करता है। हाल ही में एक बाघ शहर से सटे चंदोई गांव तक आकर दहाड़ मार गया था।
टाइगर रिजर्व और सामाजिक वानिकी की ओर से एक से 31 दिसंबर तक बाघ माह मनाया जा रहा है। जनपद में 73000 हेक्टेयर में फैला साल के पेड़ों का जंगल प्रकृति और वन्यजीवों से भरपूर है। कई नदियां और नहरें भी जनपद से होकर गुजरती हैं। बाघ संरक्षण के नाम पर पीलीभीत के जंगलों को नौ जून 2014 को टाइगर रिजर्व का दर्जा दे दिया गया, लेकिन वन्य जीवों के संरक्षण के नाम पर कुछ खास काम नहीं कराए गए। चंद वॉच टॉवर और कुछ जलाशयों को बनाकर बाघों के संरक्षण की बातें लंबे समय से की जा रही हैं। जनता को टाइगर रिजर्व बनने के फायदे और सहूलियतें भी गिनाई गईं, लेकिन वह आसपास गांवों में रहने वालों को आज तक नहीं मिल सकीं। उसका नतीजा यह निकला कि जंगल में बाघों का कुनबा बढ़कर 65 से अधिक हो गया, लेकिन जंगल का दायरा आसपास से सिकुड़ने लगा। वन विभाग की सैकड़ों एकड़ जमीनों पर कब्जे हो गए। शारदा पार तो कब्जेदार वन विभाग की जमीन पर खेती तक करने लगे हैं। वह अस्थायी कब्जेदार बनने की फिराक में हैं। जंगल के लगातार सिकुड़ने और मनुष्यों के जंगल में अत्याधिक हस्तक्षेप से मानव-वन्य जीव संघर्ष भी तेज होने लगा है। वन एरिया कम होने से बाघों के रहने की समस्या भी पैदा होने लगी है। बाघ अब जंगल से निकलकर आबादी एरिया में आकर दस्तक देने लगे हैं। वह जानवरों का शिकार करने के अलावा इंसानों पर भी हमले करते हैं। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में भी बढ़ोत्तरी हुई है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो टाइगर रिजर्व बनने के बाद वर्ष 2016 से लेकर अब तक 24 इंसान वन्यजीवों के हमले का शिकार हो चुके हैं। वर्ष 2016 में चार व्यक्ति, 2017 में 16, 18 में तीन और चालू वर्ष में एक व्यक्ति अपनी जान गंवा चुका है। वर्ष 2014 से अब तक 11 बाघों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
देश की आजादी के बाद से जनता के जो हक थे, टाइगर रिजर्व बनने के बाद उन पर सख्ती से पाबंदी लगा दी गई। अब बाघों का कुनबा बढ़ चुका है। ऐसे में यह कुनबे कैसे सुरक्षित रहेगा, इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। हालात यहां तक पहुंच गए कि वन्यजीवों के वास स्थल समाप्त होने पर बाघ उन मैदानी क्षेत्र की ओर निकल पड़े, जहां आबादी रहती है।
जंगल सीमा से सटे इलाकों में गन्ने की मिठास बढ़ते ही जंगली सुअर, नीलगाय जंगलों से निकलकर खेतों में आने लगते हैं। इनके पीछे ही बाघ भी अपना शिकार करने के मकसद से आने लगे। आबादी क्षेत्र में मानव वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ने लगीं। इससे निपटारे को वर्ष 2017 से अब तक जंगल सीमा पर करीब 155 लाख रुपये खर्च तक तार फेंसिंग कराई गई, लेकिन अब तक इनके तारों में करंट ही नहीं दौड़ पाया। ये तार फेंसिंग सोलर पॉवर की है। इसके छूने से जानवर नही मरते। करंट लगते ही वह दूर फेंक देता है।