पीलीभीत। भारत-नेपाल बॉर्डर जहां एक ओर पीलीभीत टाइगर रिजर्व और दूसरी ओर नेपाल की शुक्ला फांटा सेंक्चुरी है। यह समूचा इलाका टाइगर रिजर्व का कोर एरिया में आता है, मगर यहां अवैध कब्जे नासूर बने हुए है। इधर धान का सीजन आते ही एक बार फिर जंगल की जमीन पर कब्जे कर फसल लगाने की तैयारियां शुरू की जा चुकी हैं, मगर जिम्मेदार अभी भी चुप्पी साधे बैठे हैं। कुल मिलाकर इन सबके पीछे संयुक्त सीमांकन न होना ही सबसे बड़ी वजह है। जिसको लेकर अधिकारी गंभीर नहीं है।
इंडो-नेपाल बार्डर से सटा टाइगर रिजर्व का इलाका बीहड़ क्षेत्र में होने के कारण यहां की निगरानी करना मुश्किल है। अंतरराष्ट्रीय सीमा पिलर संख्या 27 से 29 तक लग्गाभग्गा का कोर एरिया का क्षेत्र कहलाता है। शारदा नदी के पार पीटीआर के कोर एरिया बरसों से कब्जेदारों के चंगुल में है। यहां अरसा पूर्व पेड़ों को ठिकाने लगाकर जंगल जमीन पर खेती की जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक यहां करीब 250 एकड़ से अधिक जंगल जमीन पर खेती की जा रही है। वहीं शारदा पार इलाके में गुन्हान, रमनगरा, ढकिया ताल्लुके महाराजपुर में तो 70 फीसदी जंगल जमीन पर अवैध कब्जे हैं। आरोप है कि यह गोरखधंधा विभागीय कर्मचारियों की शह पर पनप रहा है। वजह यह है कि मुख्यालय से अधिक दूरी होने के चलते वन अफसर यदाकदा ही पहुंच पाते हैं। इसी का फायदा उठाकर हर साल लाखों रुपये के बारे न्यारे किए जा रहे हैं। इसके अलावा बंदरभोज, बूंदीभूड, नौजल्हा, बरुआ कुठारा, राजपुर तालुके महाराजपुर, फैजुल्लागंज और मूसेपुर जैसे कई गांव हैं जहां कहीं सीमा विवाद है तो कहीं टाइगर रिजर्व के पक्ष में फैसला होने के बावजूद कब्जा नहीं मिल सका। इधर एक बार फिर धान की सीजन आते ही जंगल जमीनों पर कब्जे के प्रयास शुरू हो चुके है, मगर वन अफसर भी चुप्पी साधे बैठे हैं।
शारदा नदी के पार जमीनों के जो पुराने विवाद हैं और अवैध कब्जे हैं, उसको लेकर संयुक्त सीमांकन की कार्रवाई चल रही है। वन और राजस्व के संयुक्त सीमांकन के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। - नवीन खंडेलवाल, डिप्टी डायरेक्टर, पीलीभीत टाइगर रिजर्व