पीलीभीत। रुहेलखंड के एक मात्र सघन जंगल जिसे अब पीलीभीत टाइगर रिजर्व के नाम से जाना जाता है। यहां की मुख्य समस्या सिर्फ इंसानी जिंदगी पर मंडरा रहे खतरे की नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय पशु बाघ का अस्तित्व बचाने की है। जंगल के बाहर सबसे ज्यादा खतरा अमरिया क्षेत्र में आबादी एरिया में घूमने वाले बाघों पर खतरा मंडरा रहा है।
अमरिया इलाके में इंसानों पर हालांकि बाघ इंसानों पर हमलावर नहीं हुए, लेकिन जंगल क्षेत्र के बाहर घूम रहे इन राष्ट्रीय पशुओं की सुरक्षा मात्र तीन टीमों के हवाले हैं। वन विभाग की टीमें आबादी एरिया के 12 बाघों की सुरक्षा की जिम्मेदारी ठीक तरह से निभा ले जाएंगी, इसे लेकर संदेह है। नौ बाघ और दो शावक जान गंवा भी चुके हैं। बाघों की सुरक्षा के नाम पर वन विभाग की टीमें सिर्फ गांव वालों की जागरूकता गोष्ठी ही करती हैं। बाकी कुछ नहीं। अगर इन बाघों पर शिकारियों की नजर पड़ जाए तो कैसे बचाएंगे। इसकी टाइगर रिजर्व प्रशासन को भी चिंता नहीं है।
करीब 73 हेक्टेयर में फैले टाइगर रिजर्व में देखे तो यहां पिछले कुछ सालों से कई इंसान और कई बाग मारे गए। जानकार कहते हैं कि स्थितियां दोनों की खतरनाक है। प्राकृतिक संतुलन के लिए जितने अहम इंसान हैं, उतने ही बाघ। मगर हमारे जिले में सबकुछ बेपरवाह सिस्टम के हवाले ही चल रहा है। जिम्मेदार न तो न तो इंसानों की रक्षा कर पा रहे हैं और न ही यहां की धरोहर माने जाने वाले बाघों की। बेहतर जलवायु के चलते जंगलों में वन्यजीवों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। टाइगर रिजर्व के आंकड़ों के मुताबिक जंगल क्षेत्र में करीब 65 बाघ है, वहीं जंगल क्षेत्र से बाहर अमरिया में भी करीब 12 बाघों का कुनबा कई वर्षों से चलकहमी कर रहा है। विशेषज्ञों ने भी माना है कि इन बाघों के स्वभाव में परिवर्तन देखा जा रहा है, लेकिन यदि बाघों के इस कुनबे पर किसी गैंग या शिकारी की कुदृष्टि पड़ती है तो मौजूदा इंतजामों को देखते हुए वह अपने काम को अंजाम देकर आसानी से नदारद हो सकता है।
तीन टीमें और टाइगर ट्रेकर... कैसे हो रही 12 बाघों की सुरक्षा
अमरिया क्षेत्र में जंगल से बाहर घूम रहे बाघों पर गौर करें तो वर्ष 2012 में टाइगर रिजर्व से निकलकर एक बाघिन और दो शावक अमरिया क्षेत्र के शुक्ला फार्म पहुंचे। आज आठ साल में यहां बाघों की संख्या 12 तक पहुंच चुकी है। यह दीगर बात है कि पिछले डेढ़ सालों से यह बाघ कभी किसी इंसानों पर हमलावर नहीं हुए। खुले क्षेत्रों में घूम रहे बाघों की सुरक्षा इंतजामों को देखें तो वन एवं वन्यजीव प्रभाग द्वारा बाघों की सुरक्षा को लेकर तीन टीमें बनाई गई हैं जो रोस्टर वाइज अपनी ड्यूटी करती है। टाइगर ट्रेकर भी लगाए गए हैं। इसके अलावा स्थानीय लोगों को भी जागरूक किया गया है। राष्ट्रीय पशु की सुरक्षा के आगे ये इंतजाम कितने कारगर है, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
पीटीआर बनने के बाद नौ बाघ और दो शावक गंवा चुके हैं जान
16 अक्तूबर 2014: महोफ रेंज के फैज्जुलागंज में बाघ की मौत
23 अप्रैल 2015: हरदोई ब्रांच नहर में मिला था बाघ का शव
12 जुलाई 2017: हरदोई ब्रांच में डूबने से हुई थी बाघिन की मौत
23 अक्तूबर 2017: माला रेंज में मिले थे दो शावकों के शव
29 मार्च 2018: शारदा डैम में मिला था बाघ का शव
11 अप्रैल 2018: बराही में नहर पटरी पर मिला बाघ का शव
19 अप्रैल 2018: महोफ में मिला बाघ का शव
20 मई 2018: खारजा नहर पटरी पर मिला बाघ का शव
31 जुलाई 2018: बाजारघाट सुतिया नाले में मिल बाघ का शव
25 जुलाई 2019: मटहेना में संघर्ष में हुई बाघ की मौत
जंगल क्षेत्र में अमरिया में रह रहे 12 बाघों की सुरक्षा को लेकर टीमें बनाई गई है। जो रोस्टरवाइज अपनी ड्यूटी को अंजाम देती हैं। टाइगर ट्रेकर भी लगे हैं। स्थानीय लोगों को भी जागरूक किया गया है। बाघों की जंगलों में शिफ्टिंग को लेकर योजना बनाई जा रही है। - संजीव कुमार, डीएफओ, वन एवं वन्यजीव प्रभाग