तराई के इस जिले में अतिक्रमणकारियों ने जल, जंगल और जमीन तीनों पर कब्जा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। अतिक्रमणकारी सिर्फ शहर, कसबों के तालाबों आदि पर ही अवैध कब्जा नहीं कर रहे बल्कि डैम व नहर की पटरियों व बाढ़ के बाद दिशा बदल देने पर उसकी छोड़ी जमीन पर भी कब्जा करने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। इस पर कुछ पर माफियाओं की नजर है तो कुछ जरूरतमंद भी। विभागीय अधिकारियों से लेकर राजस्व महकमा तक इसके लिए जिम्मेदार है। यही वजह रही कि अवैध कब्जों को हटाने की दिशा में कभी कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए। ऐसे ही कुछ अतिक्रमणों से प्रशासनिक पक्ष के साथ अमर उजाला आपको सिलसिलेवार अवगत कराएगा। इसी कड़ी में पेश है माधोटांडा क्षेत्र के शारदा डैम के वर्जित क्षेत्र में किए गए अतिक्रमण पर रिपोर्ट।
वर्जित क्षेत्र में घर निर्माण से लेकर खेती तक कर रहे
माघोटांडा। सिंचाई विभाग का शारदा सागर डैम के बाहरी हिस्से में छ: सौ फिट चौड़ाई का एरिया, जीरो से लेकर बाइस किमी तक डैम के बर्जित क्षेत्र का एरिया कहलाता है। सिंचाई विभाग ने वर्ष 1970 में अपने वर्जित क्षेत्र को छोड़कर शेष फालतू क्षेत्र की भूमि राजस्व विभाग को ट्रांसफर कर दी थी। छ: सौ फिट चौड़ाई के इलाके में न तो आबादी बसाने का प्रावधान हैं और न ही वहां कृषि कार्य हो सकता हैं। वर्ष 1989 में शारदा में आई भीषण बाढ़ के बाद रमनगरा, ढकिया ताल्लुके महाराजपुर, बिजौरी खुर्दकला व गुन्हान के लोग बेघर हो गए। यह परिवार कहीं दूसरी जगह बसने की आस में शारदा डैम के वर्जित क्षेत्र में झोपड़ियां डाल कर बैठ गए थे और उसके बाद से लेकर अब तक सैकड़ों परिवार बाहर से आकर डैम के वर्जित क्षेत्र में बस गए हैं। करीब 700 परिवार इस वर्जित क्षेत्र में बसे हैं। सिंचाई विभाग इन परिवारों को शुरू से ही वर्जित क्षेत्र में अवैध कब्जेदार के रूप में मान रहा है, लेकिन हटाने के लिए ठोस प्रयास आज तक नहीं हुए। बीच में तत्कालीन जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने 628 बाढ़ पीड़ित परिवारों को चिह्ंित करा उन्हें दूसरी जगह तीन-तीन डिसमिल के आवासीय पट्टे भी किए, लेकिन प्रशासन ने ये पट्टे जिस स्थान पर किए वह काफी निचले स्थान पर थे। लिहाजा इन बाढ़ पीड़ित परिवारों ने उस स्थान पर यह कहकर जाने से इंकार कर दिया था कि वह स्थान नदी के किनारे है। उन लोगों को ऊंचे स्थान पर बसाया जाए। तब से लेकर आज तक यह बाढ़ पीड़ित शारदा डैम के वर्जित क्षेत्र में कब्जा जमाए हुए हैं। कुछ ने तो बाकायदा पक्की दुकानें भी बना रखी हैं।