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25 साल बाद भी नहीं मिला आशियाना

Sat, 14 Jan 2017 11:07 PM IST
ब्यूरो /पीलीभीत
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वर्ष 1989 में आई बाढ़ और वर्ष 1993 में लगी आग में अपना सब कुछ गंवा चुके सैकड़ों विस्थापित परिवारों को 25 साल बाद भी जमीन नहीं मिल सकी है। इसकी वजह से पीड़ित परिवार के लोग शारदा डैम के वर्जित क्षेत्र में रहने को विवश हैं। यहां भी इन परिवारों को उजड़ने का डर सता रहा है। अब चुनावी घमासान शुरू हो चुका है, एक बार फिर वोटों की भूख नेताओं को यहां तक ले आएगी, लेकिन क्या कोई जनप्रतिनिधि इनके दर्द को समझने की कोशिश करेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल घासफूस की झोपड़ियों में रहने वाले इन सैकड़ों विस्थापितों की आस अब टूट रही है।
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पहले बाढ़ फिर आग ने किया बेघर
शारदा की बाढ़ ने वर्ष 1989 में गांव गुन्हान, ढकिया ताल्लुके महाराजपुर, बिजौरीखुर्द कलां, रमनगरा समेत आधा दर्जन गांव की आबादी समेत कृषि भूमि निगल ली थी। इसमें सैकड़ों लोग बेघर हो गए थे। रहने को जगह न मिलने पर यह बेघर परिवार शारदा डैम के वर्जित क्षेत्र में बस गए। उस दौरान सिंचाई विभाग के अफसरों ने बस्ती से डैम की सुरक्षा को खतरा बताते हुए इसे बड़ा खतरा बताया था, लेकिन बाद में कुछ दिन की मोहलत मांगते हुए अन्यत्र बसाने की बात कही गई। मुसीबतों ने यहीं पर पीछा नहीं छोड़ा। वर्ष 1993 में घनी बस्ती के रूप में बसी इस बाढ़ शरणार्थी कालोनी में आग ने कहर बरपाया। इसमें करीब 150 से अधिक झोपड़ियां जलकर राख हो गई थी। 
राहत भी चढ़ी पानी की भेंट 
बाढ़ व आग में अपना सब कुछ गंवा बैठे करीब 65 पीड़ितों को प्रशासन ने पट्टे दिए, लेकिन मुसीबतें यहां भी कम नहीं हुई। वर्ष 1999 में नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्र में डाली गई वमनी नदी ने साल भर के भीतर ही इन गरीबों की रोजी रोटी छीन ली। जो कुछ बनाया था, वह सब एक बार फिर चौपट हो गया।
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बेदखली का भी सता रहा है डर
क्षेत्र में कई साल पहले पूर्वी पाकिस्तान से आकर यहां कई परिवार बस गए थे। सरकार ने इन विस्थापितों को पांच एकड़ भूमि व आवास देकर बसाया था। सरकार की योजनाओं का लाभ भी मिल रहा था, लेकिन वर्ष 1999 में इन विस्थापितों की समूची भूमि राजस्व अभिलेखों में वन भूमि दर्ज कर दी गई। भूमि पर विस्थापित आज भी काबिज है, लेकिन सरकारी योजनाओं से वंचित कर दिए गए। इन विस्थापितों को अब बेदखली का डर सता रहा है। 
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