सेहत महकमेे ने बेशक मातृ व शिशु मृत्यु दर में मामूली कमी कर सफलता पाई हो, लेकिन हर साल करोड़ों रुपये फूंकने के बाद भी सेहत महकमा नई जनसंख्या नीति के दौरान दिए गए लक्ष्य को डेढ़ दशक बाद भी हासिल नहीं कर सका।
वर्ष 2000 में नई जनसंख्या नीति के दौरान सेहत महकमे को शिशु व मातृ मृत्यु दर को लेकर क्रमश: 30 बच्चे प्रति हजार व 250 गर्भवती महिलाएं प्रति लाख का लक्ष्य दिया गया था। यह लक्ष्य 2015 तक पूरा किया जाना था, लेकिन महकमा डेढ़ दशक बीतने के बाद भी लक्ष्य के आसपास नहीं पहुंच सका।
कई वर्षों बाद हुआ मामूली सुधार
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो वर्ष 2014-15 में प्रति एक हजार प्रसवों में 74 शिशुओं व एक लाख में 301 माताओं की मौत हो हुई है। चालू वर्ष में प्रति हजार प्रसवों में 73 शिशुओं व एक लाख में 196 माताओं की मौत हुई। बेशक 2014-15 के आंकड़ों के मुकाबले महकमे ने चालू वर्ष में सफलता पाई हो, लेकिन संस्थागत प्रसवों की स्थिति आज भी बद से बदतर है।
संस्थागत प्रसवों में सुधार नहीं
आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में गर्भवती महिलाओं के प्रसव सरकारी अस्पतालों में कम और गांव या घरों में अधिक हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार न्यूरिया क्षेत्र में स्थिति बेहद खराब पाई गई। यहां संस्थागत प्रसव मात्र 40 प्रतिशत होना ही पाया गया।
शिशु व मातृ दर के आंकड़े:
- वर्ष 2013-14
शिशु मृत्यदर-74 प्रति एक हजार
मातृ मृत्युदर-331 प्रति एक लाख
-वर्ष 2014-15
शिशु मृत्युदर-74 प्रति एक हजार
मातृ मृत्युदर-301 प्रति एक लाख
-वर्ष 2015-16
शिशु मृत्युदर-73 प्रति एक हजार
मातृ मृत्युदर-196 प्रति एक लाख
शासन की मंशा के अनुरूप इस दिशा में सुधार की सभी कोशिशें की जा रही हैं। शिशु-मातृ मृत्युदर में पिछले सालों की अपेक्षा सुधार हुआ भी है। आने वाले समय में बड़ा अंतर देखने को मिलेगा।
डॉ. ओपी सिंह, सीएमओ