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हर रोज घुट रहा है गोमती का दम

Tue, 06 Jun 2017 10:34 PM IST
ब्यूरो /पीलीभीत
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हर रोज घुट रहा है गोमती का दम
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अवध नगरी समेत 14 शहरों के लिए जीवनदायी कही जाने वाली गोमती का दम घुट रहा है। इस नदी को प्रदूषण मुक्त व अविरल बनाने के नाम पर केंद्र व राज्य सरकारें करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं, लेकिन अपने ही जिले में गोमती अस्तित्व के लिए जूझ रही है। जिम्मेदार अधिकारियों को इससे कोई सरोकार नहीं है। गोमती आस्था से जुड़े लोग आज भी किसी भागीरथ का इंतजार कर रहे हैं।    
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नदी के पाट को खेत का हिस्सा बनाया  
गोमती मूलत: भूजल पर आधारित नदी है। सदानीरा कही जाने वाली इस नदी का मुख्य स्रोत माधोटांडा की फुलहर झील है। इसके अस्तित्व व प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखने को अरसे से लंबी चौड़ी घोषणाएं होती आ रही हैं। लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि उद्गम स्थल माधोटांडा से लेकर शाहजहांपुर बार्डर के समीप बंजारघाट तक नदी पर कब्जा कर लिया गया। शहबाजपुर, हरीपुर, इटौरिया ताल्लुके अजीतपुर, शिंभुआ व बंजारघाट में लोगों ने नदी को अपने खेतों में मिला लिया। मामला कोर्ट में होने का हवाला देकर जिला प्रशासन भी लचर पैरवी के साथ कब्जा हटाने में लाचारी जता रहा है।        
बंद हो गए गोमती के जल स्रोत      
गोमती मूलत: भूजल पर आधारित नदी है। फुल्हर झील इसका मुख्य स्रोत माना जाता है। कई झीलों से निकले पानी की वजह से इसमें पूर्व में पूरे साल पानी भरा रहता था, लेकिन जमीन की बढ़ती भूख ने गोमती के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया। झील के आसपास व रास्ते में पड़ने वाली झीलों को लोगों ने पाट लिया।
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पुनर्जीवन के लिए चले अभियान बेअसर      
कुछ साल पूर्व माधोटांडा से गोमती के संरक्षण के अभियान की शुरुआत हुई थी। 960 किमी लंबी यात्रा के बाद इसका समापन भी गंगा में समाहित होने वाले स्थान पर किया गया। इसमें स्वामी विज्ञानानंद गंगा, जैविक कृषि विशेषज्ञ राजकुमार, पर्यावरणविद् चंद्रभूषण तिवारी जैसे दिग्गज भी शामिल हुए, लेकिन इस अभियान का असर आज तक देखने को नहीं मिला। हालांकि तत्कालीन प्रदेश सरकार के कार्यकाल में गोमती की चौड़ाई बढ़ाने व अविरल धारा बहाने संबंधी प्रोजेक्टों पर कार्य चलता रहा है।   
अतिक्रमण चिह्नित तो हुए लेकिन हटाए नहीं गए
गोमती के उद्धार के लिए लखनऊ में समय-समय पर कई जिलाधिकारियों की बैठक हुई। प्रोजेक्टों को अमल में लाने के दिशा निर्देश भी दिए गए, लेकिन दुर्भाग्य था कि यह कार्य मनरेगा से कराने के आदेश दिए गए थे, दूसरे जगह-जगह अतिक्रमण को चिह्नित तो किया गया, लेकिन उस भूमि को खाली नहीं कराया गया। इसकी वजह से नदी की हालत नहीं सुधरी।    
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