पीलीभीत। पिछले पांच दशक में धीरे-धीरे शहर का विस्तार हुआ। अधिकतर बाग और पेड़ कट गए। गली-मोहल्लों में लगे बड़े-बड़े दरख्त अब नजर नहीं आते। ऐसे में सावन के महीने में झूला झूलने की परंपरा सिमटती जा रही है। महिलाएं व युवतियां अब घरों में या लॉन में रेडिमेड झूलों पर ही सावन के गीत गुनगुना रहीं हैं।
बारिश के साथ बढ़ती हरियाली सावन की दस्तक का एहसास कराती थी, लेकिन शहर और गांवों में नीम, पाकड़, बरगद समेत पेड़ों की शाखाओं पर पड़े झूलों पर मस्ती करती सखी सहेलियों और बच्चों की टोलियां भी नजर नहीं आती हैं। सखियों द्वारा गाए जाने वाले सावन के गीत भी अब सुनाई नहीं देते हैं। कब सावन आया, कब भादों निकल गया लोग जान ही नहीं पाते, बढ़ती आबादी और बढ़ते आवासीय भवनों के कारण हरियाली लुप्त होती जा रही है। जिन बड़े पेड़ों की डालों पर सावन में झूले पड़ते थे वे बड़े पेड़ आबादी वाले क्षेत्रों से गायब हो गए हैं।
समय के साथ बहुत कुछ बदला है लेकिन सावन को लेकर उत्साह कम नहीं हुआ। शिक्षक अनीता तिवारी बताती हैं कि उनके देखते- देखते शहर के तमाम बाग कट गए। गली मोहल्लों के पेड़ गायब हो गए। उन्होंने बताया कि खकरा मोहल्ले में लगे पेड़ पर झूलकर पींग बढ़ाईं थीं लेकिन नई पीढ़ी के लिए पेड़ नहीं बचे हैं। पुराने दौर जब याद करते हैं तो खुशी होती है लेकिन अब गली मोहल्लों में पेड़ न देखकर लगता कि ऐसी तरक्की का क्या फायदा जब हमें अपने तीज त्योहारों पर रस्म अदायगी तक ही सीमित रह जाना पड़े।
नेहा गोयल अब रेडिमेड झूले पर झूल कर मना रहीं सावन
मातृ शक्ति क्लब की सदस्य नेहा गोयल कहती हैं कि उनकी सास ने पेड़ पर झूला झूला है लेकिन अब जमाना बदल गया। शहरीकरण हो बहुत चुका था। पेड़ कम हो गए। शहर में तो कुछ ही स्थानों पर पड़ दिखते हैं। इसलिए घर के आंगन में लोहे से बना झूला डालकर काम चला रही हैं। अधिकतर लोगों के लिए रेडिमेड झूले ही त्योहार का सहारा हैं।
मधु कुमार बोलीं- तब आनंद कुछ और ही था
एलायंस क्लब की पदाधिकारी मधु कुमार कहती हैं कि प्रकृति के सुंदर नजारे के बीच पेड़ के नीचे झूला झूलने का आनंद ही कुछ और होता था। अब त्योहारी परंपरा रस्म अदायगी ही बची है। उनके क्लब की ओर से 31 जून को तीज महोत्सव मनाया जाएगा। नृत्य, मेंहदी और कई सारी प्रतियोगिताएं होंगी। उन्होंने बताया कि जिनक घर बड़े हैं उनके लान में झूलेंगे हैं। मोनिका विज भी घर के लान में लगे झूले में सावन का आनंद ले रही हैं।
बाजारों में झूलों की बिक्री भी नाममात्र
अब पंरपरा निभाने में रस्म अदायगी हो रही है। तमाम लड़कियां और महिलाएं ऐसी हैं जो पूरे सावन पर झूला ही नहीं झूल पाती हैं। प्लास्टिक की रस्सी वाले रेडिमेड झूले सबके घरों में नहीं है। कुछ घरों में लोहे की जंजीरों से तैयार होने वाले झूले लगवाए गए हैं लेकिन बदलते दौर में इनकी बिक्री नाममात्र रह गई। शहर में झूल बेचने का काम करने वाले व्यापारी मोहम्मद अजमल ने बताया कि पहले प्रत्येक दुकानदार के 40 से 50 झूले सावन में बिक्री हो जाते थे लेकिन अबकी बार मांग बहुत कम है। एक झूले की कीमत 11 से 15 हजार रुपये है।
जहां थे बड़े पेड़, अब खड़ी हैं कोठियां
पीलीभीत में धीरेंद्र सहाय की बगिया खत्म हो गई। कंक्रीट का जंगल बन गया। बल्लभनगर खेतों में बस गया। कृष्ण लोक हो या फिर एकता नगर यह भी खेती की जमीन पर बसाए गए हैं। इन कॉलोनियों में अब शानदार कोठियां खड़ी हैं जो पेड़ लगे थे वे अब नहीं है। इसलिए त्योहारी परंपराएं घरों तक सीमित हो गईं।
सावन माह में अशोक कॉलोनी अपने आवास पर झूला झूलती महिलाएं। संवाद- फोटो : PILIBHIT