पीलीभीत/परेवा वैश्य। देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले क्रांतिकारियों में परेवा वैश्य जैसे छोटे से गांव का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। यहां एक-दो नहीं, बल्कि 12 ऐसे क्रांतिकारी हुए, जो महात्मा गांधी का पैगाम मिलते ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े थे। देश की आजादी की खातिर इन शूरवीरों ने जान की बाजी लगा दी।
अमरिया ब्लॉक की तीसरी बड़ी ग्राम पंचायत परेवा वैश्य में 20 हजार की आबादी रहती है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वर्ष 1946 में ब्रिटिश हुकूूमत ने सूचनाएं आदान प्रदान के लिए टेलीफोन की बिछाई गई केबल काटने के आरोप में इन क्रांतिकारियों को जेल में डाल दिया था। वहां उन्हें कठोर यातनाएं दी गईं। साल भर बाद जब देश को आजादी मिली तो इन युवा क्रांतिकारियों को रिहा कर दिया गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तोताराम के पुत्र हर प्रसाद गंगवार के अनुसार वर्ष 1945 से 1946 के बीच अंग्रेज फौजों का अत्याचार देशवासियों पर काफी बढ़ गया था। इस बीच बापू का पैगाम भी गांव-गांव पहुंचने लगा था। उनके गांव में भी महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने का पैगाम भेजा। ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ कहीं कोई साजिश तो नहीं चल रही है, इसे लेकर अंग्रेजी फौज के दो सिपाही टोह लेने गांव आए। इसकी भनक उनके पिता तोताराम गंगवार और भीकम स्वरूप को हुई तो उन्होंने दोनों सिपाहियों को पकड़कर गांव में उन्हें बंदी बना लिया। हालांकि बाद में वह सिपाही गांव वालों की कैद से भाग निकले। सिपाहियों ने इसकी सूचना अमखिड़िया नहर कोठी पर लगे टेलीफोन से अंग्रेज अफसरों को दी। अंग्रेज अफसर अगले दिन पूरी फोर्स के साथ गांव पहुंचे। मगर, तब तक गांव के अधिकांश युवा अपने घरों से गायब हो गए थे।
टेलीफोन लाइन काटकर उड़ाई अंग्रेजों की नींद
सिपाहियों की पिटाई से तिलमिलाए अंग्रेज अफसर आए दिन घरों में घुसकर अत्याचार करने लगे थे। इस बीच गांव के युवाओं ने गुप्त बैठक की। इसमें दो नहर कोठियों, जिनमें अंग्रेज अफसर डेरा जमाए हुए थे, वहां टेलीफोन लाइनें काटने का निर्णय लिया गया, ताकि सूचनाओं का आदान प्रदान न हो सके। मौका मिलते ही गांव के तोताराम, भीकमस्वरुप, बद्रीनाथ, इंद्रजीत, ख्यालीराम, कुंवरसेन, हेतराम, मन्नूलाल, चोखेलाल और डोरीलाल ने परेवा से अमरिया नहर रोड के खंभों की टेलीफोन लाइन के केबल को काट दिया। इस गतिविधि में चंद्रकली और शिवइदेई ने भी बराबर से स्वतंत्रता सेनानियों का साथ दिया। इससे अमरिया नहरकोठी, खजुरीखेड़ा व अमखिड़िया नहर कोठी का आपसी संपर्क कट गया। केबल कटने की सूचना पर अंग्रेज अफसर आग बबूला हो उठे। दूसरे दिन ही फोर्स के साथ गांव पहुंचे अंग्रेज अफसरों ने सभी नौजवानों को हिरासत में ले लिया और उन्हें जेल में डाल दिया। जेल में उन्हें यातनाएं दी गईं, लेकिन किसी भी जांबाज ने अपने अन्य साथियों के नाम नहीं बताए।
आजादी मिलने पर हो गई वीर सपूतों की रिहाई
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तोताराम के पुत्र हरप्रसाद गंगवार ने बताया कि 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हो गया तो उनके पिता तोताराम समेत सभी सेनानियों को जेल से रिहाई मिल गई। इस गांव में जन्म लेने वाला कोई भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अब जीवित नहीं है, मगर उनकी स्मृतियां और देशहित में किए कार्य आज हर किसी की जुबां पर हैं।