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अंग्रेजी हुकुमत की यातनाएं भी डिगा नहीं पाईं पंडित श्रीराम शर्मा के हौसले

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बीसलपुर। अंग्रेजी हुकूमत में जब देशवासियों पर जुल्म ज्यादती का दौर चल रहा था, तब देश को आजाद कराने के लिए छोटे से गांव चंदपुरा के पंडित श्रीराम शर्मा ने भी अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजाया। अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर यातनाएं दीं। मगर, पंडित श्रीराम शर्मा को अंग्रेजों की यातनाएं अपने मकसद से डिगा नहीं सकीं। 1938 में निजाम हैदराबाद के अत्याचारों की खबर समाचार पत्रों में पढ़कर वह अकेले ही महाराष्ट्र पहुंच गए और सत्याग्रहियों के जत्थे में शामिल हो गए। वहां से हैदराबाद कूच कर दिया। गुलबर्गा में वह अपने अन्य साथियों के साथ गिरफ्तार हो गए। मगर, वह आंदोलन से पीछे नहीं हटे।
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की गाथाओं को समेटे ‘पहचान बीसलपुर’ पुस्तक में उल्लेख के मुताबिक चार सितंबर 1912 को गांव चंदपुरा में जन्मे पंडित श्रीराम शर्मा का देश के प्रति चिंता का दायरा बहुत बड़ा था। वह अंग्रेज सरकार के दमन के खिलाफ उठ खड़े हुए और स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। वर्ष 1938 में निजाम हैदराबाद के अत्याचारों की खबरें समाचार पत्रों में पढीं तो आग बबूला हो गए और स्वयं को रोक नहीं पाए। पंडित जी घर से अकेले ही निकलकर महाराष्ट्र के शोलापुर पहुंचकर सत्याग्रहियों के उस जत्थे में शामिल हो गए, जो क्रांतिकारी संजीव रेड्डी के नेतृत्व में गुलबर्गा जा रहा था। गुलबर्गा में वह अन्य सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें छह माह कैद की सजा हुई। कुछ समय बाद उन्हें गुलबर्गा जेल से हैदराबाद जेल में शिफ्ट किया गया। अगले दिन जेल अधीक्षक का निरीक्षण था। इस दौरान सभी कैदियों को कमर में कपड़ा लपेटने को कहा गया था। मगर, पंडित श्रीराम शर्मा ने ऐसा करने से मना कर दिया। जेल वालों ने इसे अपना अपमान समझा और उनकी जमकर पिटाई की। पैरों में बेड़ी और भंगा डालकर उन्हें दोहरी तन्हाई में बंद करा दिया गया। नौ फुट लंबी चौड़ी कोठरी में ही शौचालय था। कोठरी का दरवाजा भोजन देेने और शौचालय साफ करने के लिए ही खुलता था।
हैदराबाद की जेल में एक रात उनके पैरों में पड़ी बेड़ियां उलझ गईं, हाथों में हथकड़ी होने के कारण बेड़ी ठीक नहीं कर सके। अत्यधिक पीड़ा के कारण वह रात भर चिल्लाए। नायब जेलर ने रात में ही बेड़ी कटवाकर दूसरी डलवाई। नौ अप्रैल 1941 को उन्हें तीन माह का कारावास और 60 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। जुर्माना अदा न करने पर उन्हें तीन माह का अतिरिक्त कारावास मिला। अंग्रेज सरकार ने जेल में उन्हें काफी यातनाएं दीं, लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से कदम पीछे नहीं हटाए।
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आपातकाल के विरोध में जेल गए, मगर चुनाव लड़ने से इनकार
वर्ष 1975 में जब देश कठिन दौर से गुजर रहा था, तब भी पंडित श्रीराम शर्मा चुप नहीं रहे। उन्होंने आपातकाल का विरोध किया। तत्कालीन डीएम को नोटिस देकर बताया कि वह 14 अगस्त को बीसलपुर के बाजार कटरा मैदान में आपातकाल के विरोध में सभा करेंगे। प्रशासन-पुलिस ने उन्हें 14 अगस्त सुबह ही गिरफ्तार कर लिया। आपातकाल में वह छह महीने जेल में रहे। अगले वर्ष जनता पार्टी ने उन्हें विधानसभा का उम्मीदवार बनाना चाहा, लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया।
जेलों में मुसीबतें उठाईं, नहीं मानी हार
श्रीराम शर्मा को जेल की दोहरी तन्हाई से 15 दिन बाद बाहर निकालकर लक्कड़ वार्ड में रखा गया था। अगले दिन सुबह खाना खिलाकर बाहर पत्तल फेंकने के आरोप में 28 कैदियों को बाहर ले जाया गया। चार कैदियों को बैरक में खाना बनाने के लिए छोड़ दिया गया था। शाम को वापस आने पर चारों सत्याग्रही परेशान दिखाई दिए। पता चला कि उन्हें राशन के साथ जलाने के लिए मानक से कम लकड़ियां दी गईं। इस वजह से वह रोटी नहीं सेंक पाए। सभी ने कच्ची या आधी रोटियां लौकी तुरई के कच्चे टुकड़ों के साथ खाकर रात काटी। पंडित श्रीराम शर्मा ने जेल में तमाम मुसीबतें उठाईं, मगर हार नहीं मानी।
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