पीलीभीत। शहर के लाल रोड मोहल्ला बशीर खां के उस खपरैलनुमा घर में आज सन्नाटा पसरा था, वहां न तो बांसुरी बनने की खटपट सुनाई दे रही थी और न ही बांसुरी के सुर ही बिखर रहे थे। आलीशान घर से सटा यह खपरैलनुमा घर मशहूर बांसुरी कारीगर नवाब अहमद की कर्मस्थली है। जहां वह दिन-रात बांसुरी को बेहतर से बेहतर बनाने की कला साधना में जुटे रहते थे। बांसुरी कारीगर नवाब तो दुनिया से रुखसत हो गए, मगर उनकी रुखसती पर हर उस शख्स की आंखें नम हैं, जिनकी कानों में उनकी बांसुरी ने कभी मधुर सुर घोले थे। इसी खपरैलनुमा घर में बनी बांसुरियों ने देश ही नहीं, बल्कि विदेशों तक अपनी पहचान बनाई। आरएसएस की होने वाली परेड में भी उन्हीं की बनाई बांसुरी के सुर गूंजते हैं।
यूं तो संगीत में कई वाद्य यंत्र हैं, मगर बांसुरी का स्थान अलग ही है। जहां एक से बढ़कर एक इलेक्ट्रिक वाद्य यंत्र हैं, वहीं एक बांस से बनी बांसुरी अपनी अलग पहचान रखती है। मिलन केे सुखद अहसास और वियोग की टीस बयां करने वाली बांसुरी बनाने की शुरूआत करीब 125 साल पहले नत्था शेख ने की थी। नत्था शेख के बाद कारोबार को उनके बेटे अब्दुल नबी ने संभाला।
अब्दुल नबी के बाद उनके बेटों इदरीश नबी, खुर्शीद अहमद, नवाब अहमद, इरशाद अहमद, शमशाद अहमद, इकबाल अहमद, इकरार नबी और गुलजार नबी ने संभाला। नवाब अहमद ने नबी एंड संस फर्म बनाकर बांसुरी को विदेशों तक पहुंचाया। वक्त के साथ नवाब अहमद ने बांसुरी बनाने में इस हद तक महारत हासिल कर ली कि उनकी बनाई बांसुरी को लेने मशहूर बांसुरी वादक पंडित रोनू मजूमदार उनके घर तक आ पहुंचे। उनकी बनाई बांसुरी के कायल सिर्फ पंडित रोनू मजूमदार ही नहीं थे, बल्कि प्रख्यात बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया, राजेश प्रसन्ना और ऋषभ प्रसन्ना भी दीवाने थे।
मुंबई से लेकर दिल्ली के प्रगति मैदान में भी जमाई धाक
मुंबई एक्सपो, दिल्ली के प्रगति मैदान समेत कई महानगरों में नवाब अहमद की बांसुरी धूम मचा चुकी है। नवाब अहमद की पुत्री अनम के मुताबिक, उनके वालिद ढाई इंच से 72 इंच तक की क्लासिकल बांसुरी तैयार करते थे। प्रदर्शनी के दौरान तमाम बड़े संगीतकार और बांसुरी वादक उनके स्टॉल पर उनसे मिलने आते थे। उनके बड़े भाई खुर्शीद अहमद के मुताबिक, आरएसएस की होने वाली परेड में भी उन्हीं की बनाई बांसुरी के सुर गूंजते हैं।
जब पोलेंड से पहुंचे युवक ने घर के दरवाजे को चूमा
नवाब अहमद और उनके भाइयों का कारोबार देश के अलावा अमेरिका, फ्रांस, डेनमार्क, श्रीलंका, पोलेंड आदि देशों तक फैला था। नवाब अहमद के भांजे जावेद शेख ने बताया कि पोलेंड का एक अंग्रेज युवक उनकी बनाई बांसुरी से इतना प्रभावित हुआ कि वह घर तक आ पहुंचा। युवक ने घर में घुसने से पहले दरवाजे को चूमा तो नवाब अहमद ने उसे गले लगा लिया। इस दृश्य को देख लोग हतप्रभ रह गए थे।
नासिक में पंडित रोनू मजूमदार के साथ बजा चुके हैं बांसुरी
वर्ष 2013 में नासिक में श्रीश्री रविशंकर महाराज के एक कार्यक्रम में नवाब अहमद को आमंत्रित किया गया था। उनके बड़े भाई खुर्शीद अहमद ने बताया इस कार्यक्रम में नवाब अहमद ने प्रख्यात बांसुरी वादक पंडित रोनू मजूमदार के कहने पर उनके साथ बांसुरी बजाई थी। नवाब अहमद इस कार्यक्रम की अकसर चर्चा करते थे। इतना ही नहीं कार्यक्रम में मौजूद सभी बच्चों को नबी एंड संस द्वारा बनाई गई बांसुरी भी भेंट की गई थीं।
कसक जो अधूरी रह गई
बांसुरी कारीगर नवाब अहमद बांसुरी उद्योग को एक मुकाम पर ले जाना चाहते थे। इसको लेकर उन्होंने सरकार तक दरख्वास्त पहुंचाई। बांसुरी बनाने में प्रयुक्त होने वाला बांस असम के सिल्चर से आता था, वह चाहते थे कि सरकार उन्हें कच्चा माल मुहैय्या कराए, मगर ऐसा नहीं हो सका। बताते हैं कि नवाब अहमद बांसुरी में इतने रम चुके थे कि एक आलीशन घर होने के बावजूद वह उससे सटे एक छोटे से खपरैलनुमा घर में अधिकांश समय बिताया करते थे। इस घर में आज भी उनके वालिद की तस्वीर के साथ पुरानी बांसुरियां और औजार रखे हैं। जो अब सिर्फ एक इतिहास बनकर रह गए हैं।