फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

किसानों ने साठा धान की जगह खेत में मक्का लगाया... उसमें भी भारी का घाटा उठाया

विज्ञापन
विज्ञापन
पीलीभीत। किसानों पर इस बार दोहरी मार पड़ी है। एक तो लॉकडाउन में गेहूं काटने से लेकर सस्ते में बिक्री को मजबूर होकर नुकसान उठाना पड़ा। उसके बाद साठा धान पर प्रशासन ने प्रतिबंध लगा दिया। तब किसानों को यह बताया गया था कि साठा धान जमीन के अंदर का पानी सोखता है। इससे भूगर्भ जलस्तर नीचे चला जाता है। पर्यावरण को भी नुकसान है। इसलिए किसान साठा धान की जगह मक्के की खेती करें। किसानों ने यह बात मानकर मक्के की खेती की। भारी मात्रा में मक्के का उत्पादन भी कर लिया। मगर, पीलीभीत में मक्का बिक्री के लिए बाजार उपलब्ध न होने से किसानों को उसे सरकार के तय रेट 1765 रुपये क्विंटल के बजाय 350 से 500 रुपये प्रति क्विंटल बेचने को मजबूर हैं। कुछ किसान मक्का लेकर सितारगंज और रुद्रपुर भी गए। मगर, वहां भी फसल नहीं बिकी तो मजबूरी में वापस ले आए। मेहनत के बाद मक्का की फसल न बिकने से किसान मायूस हैं।
विज्ञापन

कोरोना के लॉकडाउन से पहले प्रशासन ने साठा धान के उत्पादन पर सख्ती से प्रतिबंध लगा दिया था। उन्हें विकल्प के तौर पर मक्का की खेती करने की सलाह दी गई थी। यह बात मानकर आठ हजार से ज्यादा किसानों ने करीब चार हजार हेक्टेयर एरिया में मक्के की पैदावार की, मगर, जनपद में मक्का बिक्री की कोई व्यवस्था न होने से किसानों को अब इसमें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। अब उसे औने-पौने दामों पर बेचकर किसी तरह लागत निकालने की कोशिश कर रहे हैं। तराई में छह हजार हेक्टेयर से अधिक रकवे पर साठा धान की खेती होती थी। कृषि विभाग के अफसरों ने गांवों में जाकर किसानों को साठा धान के विकल्प के तौर पर मक्का और दलहनी फसलों को लगाने की सलाह दी थी। कृषि विभाग की बात मानकर अधिकांश किसानों ने सख्ती के चलते इस बार साठा धान की जगह मक्के की फसल बोई थी। कुछ किसानों ने चोरी छिपे साठा धान लगाया तो प्रशासन ने उसे खेत में ही जुतवा दिया।
विकल्प तो बता दिया, मगर बिक्री की नहीं की व्यवस्था
आंधी बारिश की मार झेल रहे किसानों ने जैसे-तैसे मक्के की अच्छी खासी पैदावार की। मगर, अब यही उनके लिए सिर दर्द बन चुकी है। अमरिया ब्लॉक, लाहोरगंज, हरदासपुर, मोहनपुर समेत एक दर्जन से अधिक गांवों के किसानों ने मक्का की फसल लगाई थी। फसल जब पककर तैयार हुई तो किसान उसे लेकर मंडी में पहुंचे, मगर वहां बिक्री के इंतजाम नहीं थे। मायूस होकर किसान लौट गए।
विज्ञापन

किसानों ने झेली दोहरी मार
अमरिया ब्लॉक के कुछ किसानों ने साठा धान की जगह पहले मटर की फसल बोई। मगर बरसात के चलते वह बर्बाद हो गई। फिर, किसानों ने मटर की जुताई कर उसकी जगह पर मक्के की फसल बो दी ताकि कुछ मुनाफा कमा सकें, मगर, मक्का खरीदने के इंतजाम न होने से अब उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ रहा है।
मक्के की फसल ने कर दिया बर्बाद
मैंने साठा धान की जगह 14 एकड़ खेत में मक्का लगाई थी। फसल बेचने को नंबर आया तो 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से ही बिक्री हुई। मक्के की फसले ने हमें बर्बाद कर दिया। - संतोक सिंह, किसान, लाहोरगंज
कहां से चुकाएं लेबर का पैसा
मैंने साढ़े नौ एकड़ में मक्के की पैदावार की थी। फसल भी अच्छी हुई। मगर, मक्का खरीद की कोई व्यवस्था न होने से फसल को औने पौने दामों में बेचना पड़ा। अब कहां से लेबर को पैसा चुकाएं। कर्ज का बोझ भी सिर पर है। - मुस्सबर हुसैन अंसारी, किसान, अमरिया
साठा धान के विकल्प के तौर पर दलहनी फसल और मक्का लगाने की सलाह दी गई थी। इन फसलों की खरीद को लेकर उच्चाधिकारियों से अवगत कराया गया, मगर शासन स्तर से इस मामले में कोई आदेश नहीं आया। - यशराज सिंह, उप कृषि निदेशक
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें