मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का पशु प्रेम जगजाहिर है। इस लिहाज से जिले की देवीपुरा गोशाला के दिन बहुरने के कयास लगाए गए। दूसरी तरफ पशुप्रेम को लेकर खास पहचान रखने वाली केंद्रीय मंत्री मेनका संजय गांधी ने इस देवीपुरा गोशाला का निर्माण कराया है जिसकी वजह से हालात सुधरने की भी खास चर्चा थी लेकिन सब कुछ बयानबाजी तक सिमट कर रह गया है। अव्यवस्था और अनदेखी की मार झेल रहा एसपीसीए देवीपुरा गोशाला पशु अस्पताल के बजाए उनकी कब्रगाह बनता जा रहा है। औसतन प्रतिदिन तीन पशुओं की मौत यहां भूख और इलाज के अभाव में हो रही है। मई में महज 20 दिन के भीतर 52 पशुओं की मौत हो चुकी है।
एसपीसीए द्वारा दिसंबर 1996 में केंद्रीय मंत्री मेनका संजय गांधी ने माधोटांडा रोड पर जिला मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर दूर देवीपुरा गोशाला की स्थापना गोवंशीय पशुओं की रक्षा और उनके संवर्धन के उद्देश्य से की थी। यहां तस्करों से बरामद होने वाले पशुओं को बेहतर इलाज देने के साथ उनके खानपान की बेहतर व्यवस्था के दावे किए गए। एक कमेटी बनाकर इसकी देखरेख की जिम्मेदारी दी गई। समय-समय पर मेनका गांधी ने भी अपनी निधि से इसके उत्थान के लिए धन दिया, खास बात यह कि जिले के अलावा मंडल के अन्य जनपद शाहजहांपुर, बदायूं आदि से भी यहां पर तस्करों की गिरफ्त से छुड़ाए गए पशुओं को भेजा जाता है। अफसोस की बात है कि एक बेहतर उदे्श्य से शुरू की गई गोशाला अब खुद बीमार है। लंबे समय से अव्यवस्थाएं हावी हैं। पशुओं को खाने के लिए जैसे-तैसे आधा पेट सूखा चारा देकर जिंदा रखने की नाकाम कोशिश की जा रही है। हरा चारा पशुओं को खाने के लिए कभी-कभार मिल पा रहा है। इसके लिए रुपये की कोई व्यवस्था नहीं की जा सकी है। वहीं स्टॉफ को वेतन के लाले पड़े हैं। पशुओं के इस अस्पताल में इलाज के लिए दवाईयों का भी टोटा है। यही कारण है कि बीमार पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर होने के बजाए बिगड़ता जा रहा है।
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पशुओं को मिलता है चूना मिला पानी और सूखा भूसा
वर्तमान में पशुओं की संख्या को देखते हुए गोशाला प्रबंधन को प्रतिदिन 25 कुंतल भूसा और 10 कुंतल हरा चारा चाहिए। इसमें भूसे की व्यवस्था को पूरा कर लिया जाता है, लेकिन हरा चारा पशुओं को नहीं मिल पा रहा है। चूना मिला पानी और सूखा भूसा खिलाकर पशुओं का पेट भरा जा रहा है।
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वर्तमान में 440 पशु हैं
देवीपुरा गोशाला में वर्तमान में कुल 440 पशु हैं। इसमें 235 गाय-बछिया, 190 बैल-बछड़ा और 15 सांड हैं। करीब दर्जन भर पशुओं को इस माह पशुपालक ले गए है। इससे आंकड़ा पहले की अपेक्षा कम हुआ है।
तो और बिगड़ जाते हालात
सत्ता परिवर्तन के बाद पशु तस्करी को लेकर कसे गए शिकंजे से काफी राहत गोशाला प्रबंधन को मिली है। बीते दिनों की अपेक्षा पशुओं के गोशाला पहुंचने की संख्या में बड़ी मात्रा में कमी आई है। इस माह दस से 12 पशु गोशाला पहुंचे हैं। ये बीमारी की वजह से लाए गए हैं जब कि तस्करी से जुड़ा एक भी पशु नहीं आया।
कर्मचारियों को वेतन का इंतजार
गोशाला की देखरेख एवं पशुओं के इलाज, खानपान की व्यवस्था संभालने के लिए 12 कर्मचारियों को रखा गया है। इसमें सात लेबर, दो चौकीदार, एक वाहन चालक व दो चिकित्सीय टीम के सदस्य हैं। इनके लिए वेतन न मिलना सब से बड़ी समस्या है।
पशुओं को दफन कराने के लिए स्थान का अभाव
एक तरफ पशुओं के खाने का अकाल है। वहीं उनके मरने के बाद दफन कराने की जगह भी नहीं जुटाई जा सकी है। गोशाला बनाए जाने के 21 साल बाद भी इस समस्या का समाधान नहीं हुआ। सब कुछ कागजी तौर पर ही चल रहा है। स्थान के अभाव में पशुओं को मरने के बाद गोबर के ढेर में गोशाला परिसर में ही दबा दिया जाता है।
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बढ़ गया तीन लाख कर्ज
आने वाले दिनों में गोशाला की बदहाली को खत्म किया जा सकेगा, ऐसा नहीं लगता। पशुओं का भूसा, हरा चारा, दवाईयां खरीदने के लिए रुपये नहीं है। दूसरी तरफ तीन लाख रुपये का कर्ज और बढ़ गया है। इसे चुकता करने की समस्या भी बनी हुई है।
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गोशाला की अव्यवस्था के पीछे बजट का अभाव अहम कारण है। पशुओं के चारा, दवाईयों के साथ ही स्टाफ के वेतन के लिए रुपया नहीं है। कोई भी समाजसेवी मदद को आगे नहीं आया। पिछले माह तत्कालीन डीएम ने सुधार के लिए आश्वासन दिए, लेकिन इसको पूरा नहीं किया जा सका। राजनीति से हटकर समस्या के समाधान के लिए कोई काम नहीं हो रहा है।
- अरविंद मिश्रा, ड्रेसर (देवीपुरा गोशाला)