विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल कहे जाने वाले पंचायत चुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त मिली है। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और जिलाध्यक्ष सुरेश गंगवार द्वारा अलग-अलग सूचियां जारी कर प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाना पार्टी को भारी पड़ गया। दोनों की सूचियों से मात्र तीन-तीन प्रत्याशी ही जीत सके हैं।
जिले में भाजपा की गुटबाजी मोदी सरकार के बनने के समय से ही हावी है। मेनका गांधी के केंद्रीय मंत्री बनने के कुछ समय बाद प्रदेश संगठन ने सुरेश गंगवार को जिलाध्यक्ष बना दिया था। उसी समय से दोनों अपना सामांतर संगठन चला रहे हैं। दोनों में दूरियां यहां तक है कि एक-दूसरे के कार्यक्रम में झांकना तक मंजूर नहीं है और यही कारण है कि केंद्रीय मंत्री के जनपद आगमन पर उनकी एक भी भेंट जिलाध्यक्ष से नहीं हुई। पंचायत चुनाव घोषित होने पर दोनों गुटों में सक्रिय नेता जिला पंचायत चुनाव लड़ने को टिकट की लाइन में लग गए। पहले जिलाध्यक्ष सुरेश गंगवार के अनुमोदन पर प्रदेश भाजपा ने 34 प्रत्याशियों की सूची जारी। इसके अगले ही दिन अपने समर्थकों की उपेक्षा होने की बात कहकर मेनका गांधी के गुट की ओर से 34 प्रत्याशियों की सूची जारी की गई। इन सूचियों में पांच नाम ऐसे थे जो दोनों सूचियों में थे।
केंद्रीय मंत्री ने स्वयं अपने कुछ प्रत्याशियों के समर्थन में जनसभाएं की वहीं जिलाध्यक्ष ने भी गांव गांव दौरा किया। लेकिन एक ही सीट पर एक ही पार्टी से दो प्रत्याशियों की लड़ाई को जनता ने सिरे से नकार दिया। परिणाम स्वरूप दोनों गुटों से मात्र तीन तीन सीटें निकल सकी। जानकारों का मानना है कि केंद्रीय मंत्री और जिलाध्यक्ष गुटों के बीच रही नूरा कुश्ती पर अगर पार्टी हाईकमान ने जल्द नकेल नहीं कसी तो आने वाले चुनाव और भी बुरा हाल हो सकता है।