पीलीभीत। इंडो-नेपाल सीमा पर बॉर्डर सड़क का निर्माण के लिए प्रदेश सरकार ने 60.48 करोड़ रुपये जारी किए हैं, लेकिन निर्माण शुरू होने में अब भी कई दिक्कतें हैं। इन्हें अब तक दूर नहीं किया जा सका है। नेपाल सीमा के पिलर संख्या 21 से 27 तक निर्माण में बाधा आना तय है। इसका कारण यह है कि टाइगर रिजर्व का दायरा इस सड़क निर्माण से प्रभावित हो रहा है। सर्वे में आने वाली जमीन के एवज में दोगुनी जमीन अब तक टाइगर रिजर्व को देने की प्रशासन ने कोई तैयारी नहीं की है।
भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने वर्ष 2010-11 में बॉर्डर सड़क निर्माण को मंजूरी दी थी। जनपद से इंडो-नेपाल बॉर्डर के पिलर संख्या 17 के निकट उत्तराखंड सीमा तक सड़क का निर्माण किया जाना है, लेकिन सीमा पिलर संख्या 17 से 29 तक पीलीभीत का जंगल है। टाइगर रिजर्व बनने के बाद सड़क निर्माण में अड़ंगे लगने शुरू हो गए। वजह यह थी कि सर्वे के दौरान टाइगर रिजर्व का काफी दायरा प्रभावित हो रहा था, जिसके चलते टाइगर रिजर्व ने इस पर आपत्ति कर दी थी। इधर, एक बार फिर प्रदेश सरकार ने बॉर्डर सड़क के लिए 60.48 करोड़ का बजट रिलीज कर दिया, लेकिन इस इलाके में सड़क बन पाएगी या नहीं यह समय के गर्भ में है। फिलहाल बीहड़ इलाका होने के चलते बॉर्डर क्षेत्र में सड़क न होने से टाइगर रिजर्व के साथ ही सीमा सुरक्षा बल की पेट्रोलिंग करने में मजबूरन औपचारिकताएं ही निभाई जाती रहेंगी।
आज तक दूर नहीं हो सकी सर्वे के दौरान आईं बाधाएं
बॉर्डर सड़क निर्माण को मंजूरी मिलने के बाद इसका सर्वे शुरू किया गया। जनपद सीमा में भी सर्वे की कार्रवाई अमल में लाई गई। जिसमें अंतरराष्ट्रीय सीमा पिलर नंबर 17 से 21 तक टाइगर रिजर्व के वृक्ष समेत जंगल की जमीन आ रही थी। जिस पर टाइगर रिजर्व के अफसरों ने सड़क निर्माण के लिए एनटीसीए (नेशनल टाइगर अथॉरिटी) से अनुमति लेने हवाला दे दिया।
सर्वे में सामने आए थे साढ़े ग्यारह सौ पेड़
यह सड़क इंडो-नेपाल बॉर्डर से सटे इलाके में बनाई जानी थी। जहां सुरक्षा एजेंसियां, एसएसबी के जवान आसानी से पेट्रोलिंग करने के साथ ही असामाजिक गतिविधियों पर भी नजर रख सकें। सड़क निर्माण के लिए जंगल क्षेत्र को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से चौड़ाई को कम कर दोबारा सर्वे किया गया, लेकिन इसके बावजूद करीब साढे़ ग्यारह सौ छोटे बड़े पेड़ सर्वे के दायरे में आए। इसके चलते विभागीय स्तर से इसकी रिपोर्ट उच्च स्तर पर भेजी गई थी।
दोगुनी जमीन देने की कार्रवाई पर भी अमल नहीं
इंडो-नेपाल सड़क का मामला वन विभाग के अफसरों के माध्यम से शासन स्तर पर पहुंचा था। सड़क निर्माण की बाधाएं खत्म करने के लिए तय किया गया था कि सड़क निर्माण में टाइगर रिजर्व का जितना एरिया आ रहा है। उसका दोगुना रकबा तलाश कर टाइगर रिजर्व को ट्रांसफर पर देने के डीएम को निर्देश दिए गए थे। तत्कालीन डीएम ओम नारायण सिंह ने संबंधित एसडीएम को अपने-अपने क्षेत्रों में खाली पड़ी ग्राम समाज व अन्य श्रेणी की जमीन तलाश करने कर टाइगर रिजर्व को दोगुनी भूमि देने के आदेश जारी किए थे, लेकिन मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
दूसरी सड़क का भी सर्वे कर भेजी गई थी रिपोर्ट
इंडो-नेपाल सड़क निर्माण के लिए सर्वे का कार्य कई जनपदों की सीमा से लेकर जनपद से सटे टॉटरगंज क्षेत्र तक तो हुआ लेकिन पीलीभीत टाइगर रिजर्व के अफसरों ने टॉटर गंज से शारदा नदी के इस पार धुरिया पलिया क्षेत्र से पूर्व में ही बनी बॉर्डर सड़क का ही सर्वे कर उसको इंडो नेपाल बॉर्डर सड़क के लिए प्रयोग करने के लिए संस्तुति समेत रिपोर्ट शासन को भेज दी थी। टाइगर रिजर्व प्रशासन ने नदी के इस पार धुरिया पलिया से सर्वे कर पिलर नंबर 17 तक उसको पहुंचा दिया, जबकि यह दूरी बॉर्डर से काफी अधिक थी, जो पेट्रोलिंग और गश्त के लिहाज से उपयुक्त नहीं थी।
शारदा नदी समेत नदी नालों पर बनने थे पुल और पुलिया
इंडो नेपाल सीमा के पिलर नंबर 17 से 21 तक के मध्य में जगबूढ़ा नदी में गिरने वाला एक नाला पड़ता है। नदी का एक किनारा भारतीय क्षेत्र में है तो दूसरा किनारा नेपाली क्षेत्र में पड़ता है। इसके अलावा सीमा पिलर नंबर 22 से लेकर 24 तक शारदा नदी का एरिया है। जिसकी चौड़ाई काफी अधिक है। यहां पर बड़ा पुल बनाया जाना है। सीमा पिलर नंबर 24 से लेकर 27 तक एक ओर टाइगर रिजर्व का जंगल है, तो सीमा के पार नेपाल की शुक्ला फांटा सेंचुरी है। बीहड़ इलाका होने के चलते असामाजिक तत्व आए दिन तस्करी के धंधे को अंजाम देते रहते हैं।
इंडो-नेपाल बॉर्डर सड़क के सर्वे में टाइगर रिजर्व क्षेत्र में काफी अधिक पेड़ सामने आए थे। जिसके चलते अफसरों के निर्देश पर धुरिया पलिया क्षेत्र से होकर सर्वे कर दूसरी रिपोर्ट भेजी गई है। - वजीर हसन, रेंजर बराही