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पितृ पक्ष आज से : अपने गए भूल, कौन सिराए पुरखों के फूल

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पीलीभीत। मुक्तिधाम में पिछले दो साल से 70 चिताओं की अस्थियां गंगा में सिराए जाने का इंतजार कर रही हैं मगर पुरखों के फूल बीन कर कोठरी में रखने के बाद अपने उन्हें भूल गए है। परलोक गमन के बाद उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित नहीं की गई है। शनिवार से पितृ पक्ष शुरू हो रहे हैं। अगर इन 16 दिनों में फूल (अस्थि कलश) लेने कोई नहीं आया तो कमेटी के लोगों अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर देंगे। मरने के बाद भी अपनों का हाथ लगना इन अस्थियों को नसीब नहीं होगा।
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पितृ अमावस्या को सर्व पितृ श्राद्ध भी कहा जाता है। शास्त्रों के मुताबिक इस दिन पितरों को विधिवत विदाई दी जाती है। उसके बाद पूर्वज धरती से वापस परलोक चले जाते हैं। आज भी कई ऐसे परिवार हैं, जिनके पूर्वजों को परलोक गमन किए दो साल से अधिक का समय बीत गया है मगर उनकी अस्थियों का अब तक विसर्जन नहीं किया गया। माना जाता है कि मृत्यु के बाद अस्थियों का गंगा में विसर्जन होने पर ही आत्मा को मृत्यु लोक से मुक्ति मिलती है। इसके बाद भी पिछले दो साल से 70 अस्थि कलश मुक्तिधाम की कोठरी में पिछले दो साल से रखे हैं।
पुराने अस्थि कलश प्रवाहित करने की तैयारी
शहर के मुक्तिधाम की एक कोठरी में करीब 110 चिताओं से चुने गए फूल (अस्थि कलश) रखे हैं। इनमें 70 कलश ऐसे हैं, जिनका समय निकल चुका है। यह 2019 और 2020 के हैं मगर इन्हें कोई लेने नहीं आया। आज भी अस्थियां गंगा में प्रवाहित होने का इंतजार कर रही हैं। जबकि 40 अस्थियां कलश ऐसे हैं, जिनकी अभी तीन माह की समयावधि पूरी नहीं हुई है। मुक्ति धाम कमेटी को उनके परिवार के आने का इंतजार है। अगर श्राद्ध में कोई अस्थियां लेने नहीं आया तो तो अंतिम दिन कमेटी की ओर से गंगा में विध-विधान से प्रवाहित कर दी जाएंगी। इसके लिए सभी 70 अस्थियों को बाहर निकालकर सूची बनाने की तैयारी शुरू कर दी गई है।
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श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन ऐसे करें पितरों को विदा
सर्व पितृ अमावस्या पितरों की विदाई का दिन है। इस दिन श्राद्ध पक्ष का समापन होता है। पंडित आशुतोष शर्मा कहते हैं कि धार्मिक मान्यता के अनुसार बृहस्पतिवार का दिन पितरों के विसर्जन के लिए उत्तम माना गया है। इस दिन पितरों को विदा करने से पितृ और देव दोनों प्रसन्न होते हैं। यह मोक्ष देने वाले भगवान विष्णु की पूजा का दिन भी है। इस दिन पितरों के तर्पण के निमित्त सात्विक पकवान बनाएं। फिर पुरखों को याद कर विधि विधान से उनका तर्पण करें।
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