तराई क्षेत्र के बंगाली व थारू जनजाति के रोजगार के एकमात्र साधन चटाई उद्योग पर ग्रहण लग गया है। जंगल क्षेत्र के टाइगर रिजर्व होने के बाद से ही संकट के बादल मंडराने लगे हैं। करीब ढाई दर्जन कॉलोनियों के लोगों के लिए जीवनदायिनी बना यह कुटीर उद्योग अब खात्मे की ओर है।
टाइगर रिजर्व बनने से नरकुल काटने पर लगी पाबंदी
नरकुल की चटाई बनाने में करीब छह हजार से अधिक लोग जुड़े हैं। पहले नरकुल जंगलों से नीलाम लेने वाले ठेकेदार या फिर वनकर्मियों से मिलकर काटा जाता था। इसके बदले में ग्रामीण ठेकेदार व वनकर्मियों से रवन्ना या रसीद कटवाते थे, लेकिन जब से टाइगर रिजर्व बना धीरे-धीरे सख्ती होती चली गई। अब जंगल से नरकुल काटने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लग गया है।
90 प्रतिशत बंगाली परिवार जुड़े हैं इस कुटीर उद्योग से
नरकुल नदी, सुतियों व दलदली भूमि पर होता है। गर्मी व ठंड के मौसम में यह आसानी से काट लिया जाता है, लेकिन बरसात के दौरान इसे काटना मुश्किल होता है। इस काम से जुड़े 90 प्रतिशत परिवार बंगाली समुदाय से है, बल्कि यह कहा जाए कि चटाई के कुटीर उद्योग की शुरुआत यहां के बंगाली परिवारों ने की थी। इधर रोजगार का कोई साधन न होने से शारदा नदी के पार ढकिया ताल्लुके महाराजपुर सहित कई जगह थारू जनजाति के परिवार भी इस धंधे से जुड़े हैं।
नहीं मिलता मुनासिब दाम
ठेकेदार घरों में बनने वाली चटाई को महज 15 से 20 रुपये प्रति जोड़ा खरीदते हैं। ठेकेदार इन्हीं चटाईयों को सप्लायर के हाथों 25 से 30 रुपये प्रति जोड़े के हिसाब से बिक्री कर देते हैं और यही चटाई महानगरों तक पहुंचते-पहुंचते 15 रुपये से बढ़कर 150 रुपये प्रति जोड़े तक बिकती है। कारोबार से जुड़े व्यापारी बताते हैं कि गर्मी व बरसात में चटाई की मांग बढ़ जाती है।
नोटबंदी ने भी प्रभावित हुआ काम
व्यापारी जगदीश मंडल, वीजन, किरन बताते हैं कि क्षेत्र में करीब सौ से अधिक व्यापारी चटाई का काम करते हैं। एक ट्रक में 2500 से लेकर चार हजार तक चटाई भरकर ले जाई जाती है। टाइगर रिजर्व बन जाने से नरकुल कटाने पर पाबंदी लगने से पहले से ही यह धंधा ठप होता जा रहा है, ऊपर से कुछ दिन चली नोटबंदी ने भी इस कुटीर उद्योग को प्रभावित किया है। हालांकि अब धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि नरकुल काटने पर लगी पाबंदी हट जाए तो हजारों लोगों को बेहतर रोजगार मिल जाएगा।
फैक्ट फाइल:
- ढाई दर्जन कालोनियों में बनती हैं चटाइयां
- 6000 से अधिक लोग लगे हैं इस कुटीर उद्योग में
- सीजन में 80 से अधिक ट्रकों से हो जाती है महानगरों में सप्लाई
- एक व्यक्ति रोजाना बनाता है 20 चटाई