पीलीभीत। बराही रेंज के सेल्हा बीट के जंगल से सटे इलाके में जाल में फंसे तेंदुए को भले ही शुरूआत में अफसर शिकारियों की करतूत से इंकार कर वन्यजीवों से नुकसान बचाने को फसलों में लगाए गए जाल में फंसने की बात कह रहे हो, लेकिन रेस्क्यू के बाद जाल के प्लास्टिक का होने की पुष्टि होते ही अफसर गंभीर दिख रहे हैं। जिसके बाद जाल व अन्य पहलुओं को ध्यान में रखकर जांच कराने की अफसर बात कह रहे हैं।
टाइगर रिजर्व की बराही रेंज के अंतर्गत सेल्हा बीट के जंगल से सटे इलाके में शिकारियों के बिछाए जाल में एक नर तेंदुआ फंस गया था। मंगलवार सुबह सेल्हा कॉलोनी से पुरैना गांव जाने के लिए जंगल रास्ते से गुजर रहे कुछ ग्रामीणों की तेंदुए पर नजर पड़ी तो दहशत फैल गई। इसकी सूचना विभाग को दी गई थी। स्थानीय वनकर्मी मौके पर पहुंचे और कार्रवाई से बचने के लिए पहले जाल काटकर तेंदुए को निकालने का प्रयास किए गए, लेकिन सफलता न मिलने पर इसकी सूचना उच्च अफसरों को दी गई। एडीओ प्रवीण खरे के नेतृत्व में रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंच गई। फिल्ड डायरेक्टर एच राजा मोहन के पहुंचने के बाद रेस्क्यू शुरू कर तेंदुए को सुरक्षित पिंजरे में कैद कर लिया गया। वहीं अफसर इस मामले में शिकारियों की हरकत से इंकार करते हुए, बल्कि वन्यजीवों के नुकसान से फसलों को बचाने के लिए लगाए गए जाल में फंसने की बात कह रहे थे, लेकिन पिंजरे में कैद होने के बाद जब जाल में फंसे तेंदुए की स्थिति को देखा गया तो अफसर भी चौंक गए। जाल के प्लास्टिक का होने की पुष्टि हुई। इधर फसलों की बात करे तो जंगल सीमा से सटे इलाके में जाल लगाने पर पूरी तरह प्रतिबंध है। इससे किसान भी बचते हैं। वहीं यदायदा सुतलीनुमा जाल तो छोटे किसान लगा देते हैं, प्लास्टिक का नहीं। वहीं विशेषज्ञों की माने तो प्लास्टिक का जाल का इस्तेमाल अक्सर शिकारी या अन्य शातिर ही करते हैं। क्योंकि प्लास्टिक को वन्यजीव आसानी से नहीं काट पाता है। ऐसे में देखना यह है कि अफसरों की जांच में इस मामले में क्या कार्रवाई की जाती है। डीएफओ नवीन खंडेलवाल ने बताया कि तेंदुए के मामले में जाल व अन्य सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए जांच कराई जा रही है। जिसके आधार पर आगे का कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। वहीं सेव इंवयरमेंट वेलफेयर सोसाइटी के सचिव डॉ. टीएच खान ने कहना कि यदाकदा छोटे किसान फसलों का नुकसान बचाने के लिए साड़ी, जालनुमा सुतली लगा देते हैं। लेकिन प्लास्टिक का जाल का प्रयोग वन्यजीव को नुकसान पहुंचने के लिए ही किया जाता है। ऐसे में शिकार की बात से इंकार नहीं किया जा सकता। यह जांच का विषय है।