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साहब ! अस्थायी बाढ़ कार्य तो मामूली जलस्तर बढ़ते ही बह गए

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पीलीभीत। शारदा नदी की बाढ़ के खतरे को रोकने के लिए हर साल करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन जिम्मेदारों की उदासीनता के चलते बाढ़ के समय अधिकतर योजनाएं नदी में बह जाती हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। तराई क्षेत्र में 10 करोड़ की लागत से बाढ़ नियंत्रण का एक प्रोजेक्ट मंजूर हुआ, इसे पूरा करने के बावजूद अस्थायी कार्यों के नाम पर औपचारिकता निभाकर लाखों रुपये खर्च कर दिए गए। नतीजतन पिछले दिनों नदी का जलस्तर बढ़ते ही कई स्थानों पर अस्थायी कार्य पानी में बह गए। इधर, जलस्तर कम होते ही विभाग की ओर से लापरवाही छिपाने को पुन: कार्य शुरू कर दिया गया। वहीं ग्रामीणों को डर सता रहा है कि कहीं जलस्तर बढ़ते ही नदी फिर से तबाही मचानी न शुरू कर दे।
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नेपाल में महाकाली के नाम से प्रसिद्ध शारदा नदी जनपद सीमा में इंडो नेपाल बॉर्डर के नौमेंस लैंड से प्रवेश करती है। हर साल शारदा जनपद के कई इलाकों में काफी क्षति पहुंचाती है। किसानों की सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि हर साल नदी में समा जाती है। खास बात यह है कि बाढ़ के समय कटान को रोकने के नाम पर लाखों रुपये भी पानी में बहा दिए जाते है। उस समय यह कह दिया जाता है कि बरसात बाद स्थायी कार्य कराए जाएंगे। इधर क्षेत्र की स्थिति को ध्यान में रखते हुए बाढ़ खंड की ओर से कई प्रोजेक्ट शासन को भेजे गए, लेकिन दस करोड़ की लागत का एक ही प्रोजेक्ट मंजूर हो सका। जिससे रमनगरा क्षेत्र में कार्य कराए गए। इसके अलावा पिछले साल शारदा ने जहां भी बाढ़ नियंत्रण योजना को क्षति पहुंचाई उस स्थान पर अस्थायी कार्य भी करवाए। इसमें बड़ा खेल खेला गया। कट्टों में आधी अधूरी रेत भरकर पानी में डाल दिए गए, इसके अलावा अन्य कार्यों में भी औपचारिकता निभाई गई। इधर पिछले दिनों जलस्तर बढ़ने के बाद शारदा नदी के गभिया व रमनगरा क्षेत्र में कराए गए अस्थायी कार्यों को क्षति पहुंची। जिसके चलते अफसरों ने नदी के रुख को ध्यान में रखते हुए जलस्तर कम होते ही अस्थायी कार्य कराने शुरू कर दिए है। जिसमें स्पर संख्या 9ए, रमनगरा और बुझिया क्षेत्र शामिल है। बाढ़ खंड के सहायक अभियंता ध्रुवनारायण शुक्ला ने बताया कि नदी की स्थिति को ध्यान में रखते हुए कुछ स्थानों पर अस्थायी कार्य कराए जा रहे हैं।
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