गांवों का नगर कस्बों की तर्ज पर विकास कराने को सरकारें करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाती हैं, लेकिन गांवों की दशा सुधरने के बजाय और दयनीय होती जा रही है। गांव नांद में वोट देने के बाद चौपाल में बैठे बुजुर्ग ग्रामीण शनिवार को यही बतिया रहे थे। अमर उजाला टीम जब चौपाल में पहुंची तो एकबारगी सभी चुप हो गए, लेकिन परिचय देने के बाद उन्होंने सवालों का जवाब देने की हामी भर दी।
चुनाव में हुए बदलाव के बारे में पूछने पर करीब 70 वर्षीय रामकुमार ने बताया कि पहले चुनाव में ईमानदारी दूर से झलकती थी। अब नेता ईमानदार नहीं रहे तो जनता ने भी चुनाव के दौरान ईमानदारी छोड़ दी। गांव के विकास पर मोहनलाल खासे आहत दिखे। बोले: कई सालों से तो मैं खुद ही देखता आ रहा हूं। न तो सड़कें बनी और न ही नालियां। गांव के बच्चे टूटी सड़कों पर गिरते पड़ते स्कूल जाते हैं लेकिन गांव वालों का दर्द नेताओं को नहीं दिखता।
मोहनलाल की बात को बीच में रोकते हुए बुजुर्ग रामप्रसाद बोले कि पहले वोटर में ईमानदारी के साथ भोलापन था, लेकिन आज के वोटर में ईमानदारी के साथ चालाकी आ गई। आज वह उसी को वोट देता है, जो उसका काम करा दें। इसी का नेता फायदा उठाते हैं और विकास की बात बीच में ही दबकर रह जाती है। ग्रामीणों से जब सम्मान की बात पूछी गई तो युवा शिव कुमार बीच में तपाक से बोल बैठे कि सम्मान तो पुरानी बात हो चुकी है। आजकल तो चुनाव सिर्फ शराब और पैसे का रह गया है। चौपाल में मौजूद राजाराम, श्याम समेत अन्य ग्रामीण भी गांवों में विकास न होने को लेकर आहत दिखे।