जनपद का जंगल टाइगर रिजर्व घोषित होने के बाद भी वन महकमा संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। जंगल में तृणभोजी वन्यजीवों के अलावा जंगली सुअर और नीलगायों की संख्या में खासी बढ़ोत्तरी हुई है। बाघों की संख्या के आंकड़े लेजर कैमरों की गणना के बाद जो भी रहे हों, लेकिन वन कर्मियों की मानें तो बाघों की संख्या में भी खासा इजाफा हो रहा है। बाघों के जंगल से बाहर निकलने की घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। यदि महकमे ने इस पर अंकुश नहीं लगाया तो आने वाले दिनों में मानव और बाघ के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ सकती हैं।
इन दिनों वन्यजीवों में नीलगाय और जंगली सुअर अधिकतर जंगलों से बाहर निकलकर फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा रहे हैं, लेकिन इस नुकसान से कहीं अधिक खतरा जंगल से सटे इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों को बाघों से है। जंगली सुअर बाघ का प्रिय भोजन माना जाता है। ऐसे में बाघ जंगली सुअरों और नीलगायों का पीछा करते हुए जंगल से बाहर निकल रहे हैं। शिकार की तलाश में बाघ अक्सर जंगलों के बाहर नदी और नहरों के किनारे झाड़ियों तथा गन्ने के खेतों में डेरा जमाने लगे हैं। यह मानव के लिए बड़े खतरे की घंटी है। हाल ही में जंगल से सटे गांवों में बाघ और तेंदुए के हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं।
सिकुड़ता जा रहा है जंगल
टाइगर रिजर्व के जंगल के चारों ओर आबादी बसती जा रही है। टाइगर रिजर्व फारेस्ट की भूमि पर भी अतिक्रमण तेजी बढ़ रहा है लेकिन वन महकमा खामोश है। वन्यजीवों की बढ़ती संख्या के लिहाज से जंगल अब कम पड़ने लगा है। ऐसे में शिकार की तलाश या आपसी संघर्ष के चलते वन्यजीवों का जंगलों से बाहर निकलना लाजिमी है।
केस वन
दो महीना पहले हल्दीडेंगा क्षेत्र में कटरुआ बीनने गए एक ग्रामीण को बाघ ने हमला कर बुरी तरह घायल कर दिया था। हालांकि तब ग्रामीण ने जंगल के बाहर बाघ के हमला करने की बात बताई थी।
केस टू
अमरिया क्षेत्र में एक महीना पहले गन्ने के खेत में काम रहे मजदूरों पर बाघिन ने हमला बोल दिया था। इसमें एक मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गया था। उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता था।