दूसरी तरफ हर साल बाढ़ वाली यह नदी अंतर्राष्ट्रीय सीमा पिलर को जब-तब क्षतिग्रस्त करती रही है। इन दिनों नदी का रुख फिर इन दोनों पिलर की ओर है। यदि समय रहते अतिक्रमणकारियों को वहां से हटाया गया, तो नहीं कराया गया तो इन परिवारों को भी खतरा हो सकता है।
मजबूरी में बसना पड़ा
नो मैंस लैंड पर कब्जा करने वाले ये नेपाली परिवार यह तो जानते हैं कि उन्होंने गलत किया है लेकिन उनका तर्क है कि ऐसा करना उनकी मजबूरी थी। वहां रह रहे धनबहादुर, भीम बहादुर, नीतू व किशनबहादुर ने बताया कि वे लोग मूल रूप से नेपाल के कंचनपुर जिले के गांव कुतिया कवर के रहने वाले हैं। ये गांव नो मैंस लैंड से करीब दो किलोमीटर दूर था। 15 साल के अंदर सनेडी नदी ने उनकी कृषि भूमि और आवास काटती चली गई। नेपाल सरकार ने उन्हें कहीं बसने की दूसरी जगह नहीं दी। नतीजतन, ये लोग लगातार नो मैंस लैंड की ओर बढ़ते रहे। यहां से भारतीय बाजार नौजलहा व गभिया सराई नजदीक है जबकि नेपाल के बाजार करीब दस किमी दूर हैं।
पिलर नंबर 18 और 19 भारतीय क्षेत्र में बहने वाली शारदा नदी से लगा है। जहां कटान रोकने के लिए 12 ठोकरें बनाई गई हैं। पिलर नंबर 20 व 21 की तरफ बहने वाली सनेडी नदी का हिस्सा नेपाल में आता है। उन पिलर को बचाने के लिए नेपाल सरकार ही ठोकर बना सकती है।
- जीवनराम यादव, ईई शारदा सागर डैम