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आठ साल में दस बाघ गंवा चुके हैं जान

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पीलीभीत। बाघ बेशक रुहेलखंड की धरोहर हैं। मगर, टाइगर रिजर्व में बाघ संकट में है। जंगल के अंदर और बाहर बाघ एक के बाद एक काल के गाल में समाते रहे हैं। छह साल और 10 बाघों की मौत..आंकड़ा बढ़ा है। अगर बाघों की मौत इसी तरह होती रही तो राष्ट्रीय पशु के अस्तित्व पर सवाल उठने लगेंगे। बाघों की मौत कैसे हो रही है, इसका पता लगाने में वन विभाग नाकाम है। अधिकांश बाघों और शावकों के शव नहर या डैम के किनारे ही मिले। टाइगर रिजर्व प्रशासन ने पूर्व में मृत बाघों की मौत को कभी बीमारी तो कभी दूसरी वजह माना। कभी-कभी तो टाइगर रिजर्व के अफसर मृत बाघों का शव देखकर उनके उत्तराखंड से आने का बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
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पीलीभीत के जंगल को जून 2014 में टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद बेशक बाघों की संख्या में खासी बढ़ोतरी हुई है। पीटीआर (पीलीभीत टाइगर रिजर्व) प्रशासन के मुताबिक वर्तमान में जंगल में 65 से अधिक बाघ हैं, जबकि जंगल क्षेत्र से बाहर अमरिया में करीब 12 बाघ आबादी क्षेत्र के आसपास विचरण कर रहे हैं। खास बात यह है कि जिस जंगल को बाघ के संरक्षण के लिए टाइगर रिजर्व घोषित किया गया। वहीं सुरक्षित स्थान अब उनके लिए कब्रगाह साबित होता जा रहा है। जंगल से निकलकर आबादी क्षेत्रों में घूम रहे बाघों की सुरक्षा को लेकर अमर उजाला ने 10 फरवरी के अंक में प्रमुखता से खबर को प्रकाशित किया था। जिसके माध्यम से मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं से आक्रोशित होकर कहीं लोग बाघ की जान के दुश्मन न बनाए, इस आर पीटीआर का ध्यान आकृष्ट कराया। पीटीआर बनने के बाद पहले 24 और 25 मई 2012 को हरीपुर रेंज में धनाराघाट बीट में लगातार दो बाघ के शव मिले थे। उस दौरान इन बाघों की जहर से मौत होना पाया था। इसके बाद पूरनपुर क्षेत्र में ही 12 जून 2012 को बाघ का शव मिला था। वर्ष 2013 में 26 नवंबर को बराही रेंज के कपांर्टमेंट 79बी में बाघ के शव पाया गया था।
टाइगर रिजर्व बनने के बाद पहली घटना 16 अक्तूबर 2014 को महोफ रेंज के फैज्जुलागंज बीट में बाघ का शव मिला था। जो आपसी संघर्ष में मारा जाना बताया गया था। लगभग आठ माह बाद ही 23 अप्रैल 2015 में बराही रेंज के समीप डगा गांव के पास बहने वाली हरदोई ब्रांच नहर में बाघ का शव मिला था। हालांकि इस घटना के बाद वन विभाग ने कुछ शिकारी पकड़े थे। इनसे कुछ आपत्तिजनक सामान भी मिला था। साल 2017 में सात मई को माला रेंज में ढहैना ताल के समीप दो शावकों के शव पाए गए थे। वर्ष 2018 की बात करें तो पूरे में साल पर चार बाघों ने जान गंवाई। 29 मार्च 2018 को बराही रेंज के ही पास शारदा सागर डैम में बाघ का शव मिला था। इसी वर्ष 10 अप्रैल को पूरनपुर क्षेत्र में दो बाघ शावक के शव मिले थे। ठीक नौ दिन बाद यानी 19 अप्रैल को महोफ में बाघ का शव और एक माह बाद यानी 20 मई को एक टाइगर शावक का शव मिला था। इस बीच मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं तेजी से प्रकाश में आने लगी। इंसानों का बाघों के प्रति आक्रोश बढ़ता गया। इसके परिणामस्वरूप गत वर्ष 27 जुलाई को दियोरिया रेंज के मटहेना में भीड़ ने एक बाघ को पीट-पीटकर मार डाला। छह माह तक बाघों की मौत का सिलसिला रुका रहा, लेकिन वर्ष 2020 में एक और बाघ का शव हरदोई ब्रांच नहर में पाया गया। हालांकि इस बाघ की मौत कैसे हुई है, इसका खुलासा तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आने के बाद ही चल सकेगा। फिलहाल जिन बाघों की सुरक्षा को लेकर जंगल को टाइगर संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया, वहीं बाघ एक-एक कर जान गंवा रहे हैं। इस मामले में टाइगर रिजर्व के अफसरों का कहना है कि पूर्व में हुई बाघों की मौत अलग-अलग कारणों से हुई है।
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