पीलीभीत। लखीमपुर क्षेत्र में बाघ द्वारा एक बच्चे को उठाने के बाद उसे निवाला बनाने की घटना के बाद यहां के वन्यजीव प्रभावित इलाकों में दहशत है। वजह यह है कि जनपद के अमरिया और गजरौला क्षेत्र में वर्षों से बाघों और तेंदुओं की चहलकदमी से दहशत बरकरार है। शाम होते ही बाघ और तेंदुआ प्रभावित गांवों के ग्रामीण घरों में दुबक जाते हैं। शाम के बाद बेहद जरूरतमंद ही सड़कों पर देखे जाते हैं। जिम्मेदार टाइगर रिजर्व प्रशासन और वन एवं वन्यजीव प्रभाग केवल निगरानी तक ही सीमित है।
पीलीभीत टाइगर रिजर्व करीब 73000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फैला हुआ है। प्राकृतिक संपदा से भरपूर इस जंगल में करीब 65 बाघों समेत अन्य वन्यजीवों की संख्या भी बहुतायत में है, मगर पिछले आठ सालों से करीब 12 बाघ जंगल से निकलकर अमरिया क्षेत्र की आबादी में डेरा जमाए हुए हैं। वहीं माला रेंज के अंर्तगत आने वाले गजरौला क्षेत्र में पिछले डेढ़ साल से बाघ आतंक मचाए हुए हैं। आबादी में प्रवास कर रहे इन बाघों को जंगल में वापस भेजने के कई बार प्रयास किए गए, लाखों रुपये भी खर्च किए गए, मगर सब विफल रहा।
अमरिया में 40 हजार आबादी पर बाघ-तेंदुआ का मंडरा रहा खतरा
अमरिया क्षेत्र में वर्ष 2012 में एक बाघ से शुरू हुआ सिलसिला आज 12 बाघ पर पहुंच चुका है। ये बाघ जंगल से निकलकर आबादी क्षेत्र में शरण लिए हुए हैं। बाघों की दहशत में जी रहे इस बड़ी आबादी को अब पिछले तीन माह से तेंदुओं की दहशत का भी सामना करना पड़ रहा है। अमरिया क्षेत्र कटैइया, बिरहनी, भरा पचपेड़ा, भूड़ा, कैमोर, जगत, विशनपुर, रसूला, कटमटा, कटमटी, सूरजपुर, हिमकनपुर, अंडराइन, निवाड़ ऐंठपुर, बेहरी समेत करीब 25 गांव ऐसे हैं, जहां पिछले कुछ वर्षों से ग्रामीण लगातार बाघों और तेंदुओं की दहशत के बीच जी रहे हैं। इन गांवों की करीब 40 हजार के आसपास आबादी शाम होते ही घरों में दुबक जाती है। इन गांवों में कुछ गांव ऐसे हैं, जहां लगातार 24 घंटे बाघ की चहलकदमी रहती है। शाम के बाद सिर्फ जरूरतमंद ही सड़कों पर नजर आते हैं। यह दीगर बात है कि यहां पिछले डेढ़ साल से कोई जनहानि नहीं हुई।
गजरौला में बाघों की दहशत नहीं हो रही कम
टाइगर रिजर्व की माला रेंज समीप गजरौला क्षेत्र में बाघों की दहशत कम नहीं हैं। यहां अकसर ही किसी न किसी क्षेत्र में बाघ की चहलकदमी की घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं। यहां पिछले डेढ़ साल से बाघ आतंक मचाए हुए हैं। बाघों को पकड़ने के लिए यहां तीन बार चले अभियान के दौरान एक बाघिन और एक बाघ तो पकड़े गए, मगर एक बाघ की ट्रैंक्यूलाइज के बाद मौत हो गई। चालू वर्ष में बाघ हमलों में मौतों का ग्राफ भी सर्वाधिक इसी क्षेत्र में बढ़ा है। अकेले गजरौला क्षेत्र में फरवरी से मई तक सात ग्रामीण बाघों हमलों में अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। क्षेत्र के सिरसा सरदाह, महुआ, बैजूनागर, विधिपुर, लालपुर, ग्रांट नंबर एक उर्फ वानगंज ऐसे गांव हैं, जहां बाघों का आतंक रहता है। यहां भी ग्रामीण झुंड के रुप में ही खेतों पर आते जाते हैं। तनिक सी लापरवाही होने पर किसी को भी जान से हाथ धोना पड़ सकता है।
वन्यजीव के हमलों में जान गंवाने की घटनाओं पर एक नजर
तारीख मृतक स्थान
01 फरवरी 2020 फूलचंद बैजूनगर
05 फरवरी 2020 रुपलाल विधिनपुर
21 मार्च 2020 रमोनी देवी माला कॉलोनी
30 मार्च 2020 कृष्णा राय माला कॉलोनी
03 अप्रैल2020 निंदर सिंह रिच्छोला फार्म
03 अप्रैल2020 डोरीलाल ढेरम मंडरिया
08 मई 2020 शिवेंदु मंडल गोयल कॉलोनी
दो बाघ भेजे चिड़ियाघर, एक की हुई मौत
03 अप्रैल 2020 को माला रेंज से एक बाघ रेस्क्यू कर भेजा गया कानपुर
06 जून 2020 को माला रेंज से एक बाघिन को पकड़कर भेजा गया कानपुर
03 मई 2020 को रेस्क्यू के बाद हुुई बाघ की मोैत
अमरिया क्षेत्र में तेंदुआ को पकड़ने के लिए अभियान चल रहा है। चार स्थानों पर पिंजरे लगाए गए हैं। कैमरों से निगरानी भी की जा रही है। यहां के बाघों की शिफ्टिंग का मामला भी शासन स्तर पर चल रहा है। - संजीव कुमार, डीएफओ, वन एवं वन्यजीव प्रभाग