प्रशासन और हिंदू संगठन आमने-सामने
असम हाईवे पर आठ दिन पहले पीडब्ल्यूडी की जमीन पर अतिक्रमण बताते हुए डीएम के निर्देश पर तोड़े गए सिद्धबाबा मंदिर के पुन: उसी स्थान पर निर्माण कराने की मांग को लेकर शुरू हुए विवाद में बृहस्पतिवार को प्रशासन और विहिप, हिंजामं समेत कई हिंदू संगठन आमने-सामने आ गए हैं। प्रशासन निषेधाज्ञा लागू होने और घटनास्थल पर किसी तरह का अनशन न होने की देने की बात कह रहा है। वहीं नेताओं ने प्रेस नोट जारी कर एक जून से अनशन की शुरुआत करने का ऐलान कर दिया है। पुलिस एवं प्रशासनिक अफसर नेताओं से संपर्क साध कर मनाने में जुटे हैं। 23 मई को डीएम के आदेश पर पूरनपुर गेट पुलिस चौकी के पास स्थिति सिद्धबाबा मंदिर को सरकारी जमीन पर अतिक्रमण बताकर तोड़ दिया गया था। इसके बाद आसपास के ग्रामीणों ने एक व्यापारी से मोटी रकम लेकर कार्रवाई करने का आरोप लगाते हुए सड़क पर उग्र प्रदर्शन किया था। पहले दिन हाईवे पर जाम लगाया गया तो दूसरे दिन आक्रोशित ग्रामीणों ने पुलिस पर पथराव कर तीन बाइकों को फूंक दिया था। जिसके बाद दर्जन भर लोग जेल भेजे गए। प्रशासन खुद की कार्रवाई को सही बताने पर अड़ा है। इधर चार दिन पहले विश्व हिंदू परिषद, हिंदू जागरण मंच, भारतीय मजदूर संघ के जिलाध्यक्षों ने भाजपा नेता दीपक अग्रवाल की अगुवाई में डीएम को ज्ञापन दिया था। जिसमें तोड़े गए मंदिर को उसी स्थान पर दोबारा स्थापित कराने, दर्ज किए गए मुकदमे को समाप्त करने आदि की मांग को लेकर 31 मई तक सकारात्मक जवाब मांगा था। ऐसा न होने पर एक जून से अनशन की चेतावनी दी थी। बुधवार देर शाम तक कोई प्रशासनिक स्तर से संतोषजनक जवाब न मिलने पर विहिप जिलाध्यक्ष अंबरीश मिश्रा के पैड पर बृहस्पतिवार से अनशन करने का ऐलान कर दिया गया है। इधर प्रशासन घटनास्थल व आसपास के गांवों में धारा 144 लागू होने की बात कहते हुए किसी तरह का अनशन करने की अनुमति नहीं दे रहा है। जारी किए गए प्रेसनोट में भाजपा प्रवक्ता दीपक अग्रवाल, सेवा भारती संरक्षक कैलाश गुप्ता, भारतीय मजदूर संघ जिलाध्यक्ष सूर्यकांत शंखधार, हिंदू जागरण मंच जिलाध्यक्ष वेद प्रकाश शुक्ला, विहिप जिलाध्यक्ष अंबरीश मिश्रा के हस्ताक्षर हैं।
वार्ता विफल रही
नेताओं के अनशन करने का ऐलान करने के बाद पुलिस एवं प्रशासनिक अमले में खलबली मच गई है। नेताओं को अनशन न करने की बात पर मनाने के लिए पुलिस अधिकारी संपर्क साधने में जुट गए। देर शाम तक बातचीत कर उनको आश्वस्त करने की कोशिश की गई, ताकि वह अनशन से पीछे हट जाएं, लेकिन नेताओं के न मानने पर वार्ता पूरी तरह से विफल रही।