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अंग्रेजी हुकूमत की यातनाएं डिगा नहीं पाईं श्रीराम के हौसला

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बीसलपुर। अंग्रेजी शासन काल में जब ज्यादती और जुल्म का दौर जारी था, तब गांव चंदपुरा निवासी श्रीराम शर्मा निजाम हैदराबाद के अत्याचारों की खबरें पढ़ने के बाद आजादी के आंदोलन में कूद पड़े थे। महाराष्ट्र जाकर सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तारी दी। अंग्रेजों ने उनपर कई जुल्म ढाये मगर उनका हौसला पस्त नहीं कर पाए।
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गांव चंदपुरा निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य रामगोपाल शर्मा ने बताया कि उनके पिता श्रीराम शर्मा का जन्म 4 सितंबर, 1912 को हुआ था। वह 1938 में निजाम हैदराबाद द्वारा भारतीयों पर जुल्म ढाने की खबरें अखबारों में पढ़ने के बाद वह गुस्सा रोक नहीं पाए थे। अकेले ही शोलापुर (महाराष्ट्र) पहुंच गए थे और सत्याग्रहियों के उस जत्थे में शामिल हो गए थे, जो क्रांतिकारी संजीव रेड्डी के नेत़ृत्व में गुलबर्गा जा रहा था। गुलबर्गा शहर में वह गिरफ्तार हो गए थे। छह माह की सजा हुई थी।
कुछ समय बाद उनका स्थानांतरण गुलबर्गा जेल से हैदराबाद जेल में हो गया। जिस दिन वह हैदराबाद जेल पहुंचे उससे अगले दिन जेल अधीक्षक का निरीक्षण था। निरीक्षण के दौरान जेल कर्मचारियों ने सभी कैदियों को कमर में कपड़ा लपेटने को कहा। श्रीराम शर्मा ने ऐसा करने से मना कर दिया। जेल अधीक्षक ने इसे अपमान समझा। जेल अधीक्षक ने उनकी काफी पिटाई लगवाई। पैरों मेें बेड़ी डालकर उन्हें दोहरी तन्हाई में बंद करवा दिया।
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नौ फुट लंबी चौड़ी उस कोठरी का दरवाजा केवल भोजन देने और शौचालय साफ करने के लिए ही खुलता था। आंदोलन के दौरान वे कई बार जेल गए। नौ अप्रैल 1941 को उन्हें तीन माह की सजा और 60 रुपया जुर्माना अदा करने की सजा सुनाई गई। जुर्माना अदा न करने पर उन्हें तीन माह के अतिरिक्त कारावास की सजा भी दी गई। गोरों ने उन्हें काफी यातनाएं दी लेकिन उन्होंने कदम पीछे नहीं हटाए। वर्ष 2002 में उनका निधन हो गया।
आपातकाल के विरोध में भी गए, विधायकी का टिकट ठुकराया
रामगोपाल ने बताया कि वर्ष 1975 में उन्हें आपात काल लागू होने के दौरान जब पूरा देश अंधकार के एक कठिन दौर से गुजर रहा था, तब उनके पिता चुप नहीं बैठ पाए। उन्होंने आपात काल का विरोध करते हुए तत्कालीन डीएम को चिट्ठी भेजकर कहा कि वह 14 अगस्त को बाजार कटरा बीसलपुर में आपात काल का विरोध करेंगे। 14 अगस्त को सुबह आठ बजे उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वह इस सिलसिले में छह माह जेल में रहे। वर्ष 1976 में वह छूटकर आए। वर्ष 1977 में जनता पार्टी ने उन्हें बीसलपुर सीट से विधायक पद का उम्मीदवार बनाना चाहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया था।
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