पीलीभीत। लंबे समय से शारदा की बाढ़ का दंश झेल रहे तराई क्षेत्र के नगरिया खुर्दकलां गांव की थारू बस्ती के परिवारों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। बस्ती वन भूमि पर बसी होने के चलते यहां लंबे समय से कोई विकास कार्य भी नहीं हो पा रहे हैं। हालांकि ये बाशिंदे अपने कब्जे की भूमि पर ही सरकारी लाभ लेना चाहते हैं, लेकिन वन भूमि होने के चलते टाइगर रिजर्व प्रशासन विकास की है। ऐसे में सवाल उठता है कि ये 31 थारू परिवार के लोग कहां जाएं?
नगरिया खुर्दकलां ग्राम पंचायत का एक गांव शारदा नदी के पार पड़ता है। वर्ष 1989 में शारदा में आई भीषण बाढ़ से इस गांव की पूरी आबादी और कृषि भूमि नदी की भेंट चढ़ गई। उस दौरान यहां बंगाली विस्थापित परिवार बसे थे। हालांकि बाद में शारदा नदी ने इस इलाके की भूमि को छोड़ दिया। तबसे यहां लोग खेती करते आ रहे हैं। इसके बाद वन विभाग ने कार्रवाई कर वर्ष 1997 में लग्गा भग्गा क्षेत्र में बसे थारू जनजाति के परिवारों को यह कहकर उजाड़ दिया कि लग्गा भग्गा की समूची भूमि वन विभाग की है। इसके बाद राजस्व प्रशासन ने ऐसे 45 थारू परिवारों को ढकिया ताल्लुके महाराजपुर ग्राम पंचायत में तीन-तीन डिसमिल जमीन के आवासीय पट्टे देकर बसा दिया। बाकी थारू परिवार कटकवारा और उत्तराखंड के खटीमा क्षेत्र में चले गए थे।
पट्टे होने के बाद भी नहीं मिलीं सुविधाएं
थारू जनजाति के 45 परिवारों के आवासीय पट्टे यह कहकर निरस्त किए गए थे कि इसके बदले सभी को इंदिरा आवास समेत अन्य विकास योजनाओं का लाभ दिया जाएगा, लेकिन लाभ के बीच वन विभाग का हस्तक्षेप आड़े आ गया। जल निगम के हैंडपंप भी नहीं लगने दिए गए। इस समस्या को लेकर थारू परिवारों ने विधायक से लेकर जिला प्रशासन तक के चक्कर काटे। नतीजा यह निकला कि इंदिरा आवास तो नहीं बनने दिए, लेकिन झोपड़ी डालकर रहने की इजाजत दे दी गई।
प्रधान के प्रयासों पर भी फिरा पानी
आरक्षण के चलते ग्राम पंचायत के चुनाव में थारू बस्ती के फिरुआ राना की पत्नी रामवती राना ग्राम प्रधान बनीं। इसके बाद उन्होंने इस समस्या को प्रमुखता से उठाया और शासन स्तर तक दौड़ भाग शुरू की। नतीजा भी सफल रहा, 52 परिवारों के दो-दो एकड़ कृषि भूमि के पट्टे किए गए। हालांकि इसकी भनक लगते ही वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए सभी पट्टे साल भर में निरस्त करा दिए।
तो वन भूमि पर कर रहे खेती
थारू परिवारों की आबादी साल दर साल बढ़ती गई। सरकारी महकमों के चक्कर लगाकर थक चुके इन परिवारों ने वनकर्मियों को दुखड़ा सुनाकर धीरे-धीरे भूमि की जुताई करते गए और आज यहां 400 एकड़ भूमि पर खेती हो रही है। वर्तमान में यहां करीब 150 से अधिक लोग बस चुके हैं।
मंजूर सरकारी आवासों का नदी के इस पार कराया निर्माण
ग्राम पंचायत की बंगाली महिला चंपा राय ग्राम प्रधान बनीं तो उन्होंने आवास और शौचालय बनवाने के प्रयास किए। इसके लिए वन अधिकारियों से भी संपर्क किया गया, लेकिन टाइगर रिजर्व प्रशासन ने निर्माण कार्य कराने से इंकार कर दिया। इसके बाद थारू परिवारों ने स्वीकृत 20 इंदिरा आवास पूर्व में और 11 प्रधानमंत्री आवास वर्तमान में स्वीकृत हुए हैं। जो नदी के इस पार ही बन रहे हैं। इनमें अधिकतर आवास बन चुके हैं।
प्रधान की बात
मेरे कार्यकाल में 31 सरकारी आवास स्वीकृत और करीब 40 शौचालय भी शामिल हैं। वन विभाग की ओर से थारू बस्ती में निर्माण कार्य पर रोक के चलते थारू बस्ती के लोग नदी के इस पार जमीन लेकर आवास बनवा रहे है। इसमें अधिकतर आवास बन भी चुके हैं।
- चंपा राय, ग्राम प्रधान, नगरिया खुर्दकलां
थारू जनजाति की बस्ती आरक्षित वन क्षेत्र में नहीं है, लेकिन आवासों का जहां निर्माण करा जा रहा है वह वनभूमि है, इसलिए विभाग द्वारा वहां कार्य नहीं होने दिया जा रहा है।
- प्रवीण खरे, एसडीओ, टाइगर रिजर्व
थारू जनजाति की बस्ती में पूर्व वर्षों में 45 आवासीय पट्टे किए गए थे। जिन पर आज लोग काबिज हैं। संयुक्त सीमांकन न होने के चलते वन विभाग ने निर्माण कार्यों पर रोक लगा रखी है। संयुक्त सीमांकन के बाद ही स्थिति साफ हो सकेगी।
विजय कुमार त्रिवेदी, तहसीलदार, कलीनगर