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कोई बम बनाता कोई डाक बांटने का करता था काम

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09 पीबीटीपी 11
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कोई बम बनाता कोई डाक बांटने का करता था काम
क्रासर....
खांडेपुर के 23 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में जलाई थी क्रांति की लौ
क्रासर...
मंडल की कई महत्वपूर्ण बैठकें होती थी इस गांव में
क्रासर...
चंद्रशेखर, भगत सिंह समेत तमाम नेता कर चुके सभा
अमर उजाला ब्यूरो
बीसलपुर। देश की आजादी में पीलीभीत का खासा योगदान रहा। इस जिले का में खांडेपुर ऐसा गांव है जहां 23 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में क्रांति की लौ जलाई थी। गांव में आज भी वह चबूतरा है जहां सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद सरीखे कई आंदोलनकारी इस गांव में पहुंच कर सभा कर चुके हैं। बम बनाने से लेकर डाक बांटने तक का काम यहां के लोगों ने किया। नाखूनों में बांस की कीलें ठोकी गईं पर गोरों का जुल्म उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सका।
देवहा नदी की तलहटी में बसे करीब पांच हजार की आबादी वाले इस गांव को बरेली मंडल में सर्वाधिक 23 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जन्म देने का गौरव भी प्राप्त है। मां भारती के ये अमर सपूत इस गांव की माटी में खेलकूद कर जवान हुए और देश को आजाद कराने का संकल्प लेकर जंग ए आजादी में कूद पड़े थे। इन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का देश आजाद कराने का तो सपना पूरा हो गया था, लेकिन उन्होंने अपने गांव की कायाकल्प का जो सपना देखा था वह आज तक पूरा नहीं हुआ। इन 23 में से कोई भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अब इस दुनिया में नहीं है। उनके परिवार के लोग शासन प्रशासन की उपेक्षा के चलते बदहाली का जीवन जी रहे हैं।
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गांव के गांधी चबूतरे पर होती थी बैठक
आजादी की लड़ाई के दौरान इसी गांव में बने गांधी चबूतरे पर बैठ कर पूरे मंडल के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रणनीति बनाते थे और उसके बाद उस रणनीति पर अमल किया जाता था। वर्ष 1942 में आजादी की लड़ाई के संबंध में इस गांव में एक कांफ्रें स हुई थी जिसमें महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरू, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, विजय लक्ष्मी पांडेय, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह और रामप्रसाद बिस्मिल आदि क्रांतिकारी आए थे जिन्होंने आजादी की लड़ाई के संबंध में महत्वपूर्ण योजना बनाई थी। बैठक होने के बाद बाहर से आए नेता तो चले गए थे, लेकिन भनक लगते ही अंग्रेजों ने यहां आकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर जमकर लाठियां बरसाई थीं और मौके से गिरफ्तार सभी लोगों को अलग अलग जेलों में ठूूंस दिया था। गांव के शरदपाल ने बताया कि उनके दादा रामस्वरूप स्वतंत्रता संग्राम संघ के मंडल कमांडर थे। एक बार घर पर बम बनाते समय ब्रिटिश सैनिकों ने उन्हें पकड़ा था और सजा के तौर पर उनके नाखूनों में बांस की कीलें ठोंकी थीं। उन्हें लखनऊ, सीतापुर, पीलीभीत और बरेली समेत कई जेलों में रखा गया था। वर्ष 1984 में उनका निधन हो गया था।

हर किसी ने बांट रखा था काम
इस गांव में अंग्रेजों के शिविरों पर हमला करने के लिए बम भी बनाए जाते थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अलग अलग काम मिला हुआ था। कुछ लोग डाक बांटते थे, कुछ लोग शस्त्र और कारतूस बनाते थे। कुछ लोग आंदोलन की रणनीति बनाते थे, कुछ लोग निगरानी करते थे।

राजनेताओं से विश्वास उठा जनता का
गांव खांडेपुर में वर्ष 1997 में भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष और मौजूदा केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ ंसिंह आए थे। उन्होंने अपने भाषण में ग्रामीणों की सामूहिक मांग पर गांव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का स्मारक बनवाने की घोषणा भी की थी जो आज तक पूरी नहीं हो पाई।

गोरखपुर, अलीगढ़ के कारीगरों से सीखा था बम बनाना
खांडेपुर के दिवंगत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महाशय रामस्वरूप के पौत्र शरदपाल सिंह ने बताया कि उनके दादा ने अलीगढ़ और गोरखपुर के जानकारों से बम बनाना सीखा था।

ये थे आजादी के दीवाने
महाशय रामस्वरूप, चंदनलाल, छोटेलाल, छेदालाल, शिवचरनलाल, प्यारेलाल, सत्यदेव, बांधूलाल, नत्थूलाल, रामचरनलाल, बालकराम, सुमेरलाल, बद्रीप्रसाद, बैजनाथ, लालजीत, चोखेलाल, लाहौरी सिंह, सेवाराम, रोशनलाल, रघुनंद्र प्रसाद, ख्यालीराम, जगदीश प्रसाद और अयोध्या प्रसाद आदि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।
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खांडेपुर का है मंडल में प्रथम स्थान
खांडेपुर की मौजूदा प्रधान प्रेमो देवी का दावा है कि 23 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जन्म देने के मामले में खांडेपुर का पूरे बरेली मंडल में प्रथम स्थान है।
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