तराई के 30 किमी लंबे इलाके में बसे गांवों में लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा भगवान भरोसे है। शासन ने यहां आठ साल पहले 65 लाख रुपये खर्च कर न्यू प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो बनवा दिया, लेकिन आज तक यहां एक भी डॉक्टर की तैनाती नहीं की गई है। सरकारी अस्पताल मात्र एक फार्मेसिस्ट के सहारे चल रहा है। नजदीकी क्षेत्र में कोई सरकारी अस्पताल न होने के चलते यहां इलाज के अभाव में अक्सर बीमार दम तोड़ देते है। जिम्मेदार अफसर डॉक्टरों की कमी बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
सात सृजित पदों में दो ही भरे
न्यू पीएचसी में एक डॉक्टर, एक फार्मेसिस्ट, एक लैब टेक्नीशियन, एक स्टाफ नर्स, एक वार्ड ब्वॉय और दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद सृजित हैं, लेकिन यहां मात्र एक फार्मेसिस्ट और एक वार्ड ब्वॉय ही तैनात है। इनके सहारे ही मरीजों का इलाज हो रहा है।
आज तक मिलते रहे सिर्फ आश्वासन
पीएचसी में डॉक्टर समेत अन्य स्टाफ की तैनाती को लेकर क्षेत्रवासियों ने कई बार धरना प्रदर्शन से लेकर अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के आगे गुहार भी लगाई, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। ग्रामीण बताते हैं कि यहां पूर्व में तैनात रहे सीएमओ डॉ. परमिंदर सिंह और डॉ. राकेश तिवारी ने धरना प्रदर्शन के बाद स्वास्थ्य कैंप लगवाए और शीघ्र ही डॉक्टर की तैनाती का आश्वासन भी दिया, लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ।
इलाज के लिए जाना पड़ता है 40 किमी
इस अस्पताल से नेपाल सीमा से सटे सुंदरनगर, बंदरबोझ, बूंदीभूड़, मठइयालालपुर, नौजल्हा नंबर एक, नौजल्हा नंबर दो, महाराजपुर समेत करीब 30 गांव जुड़े हैं। डॉक्टर न होने के चलते इन गांवों के लोगों को इलाज के लिए जंगल के खतरनाक रास्ते से होकर 40 किमी दूर माधोटांडा सीएचसी जाना पड़ता है।
जैसे तैसे चल रहा है अस्पताल
पीएचसी में तैनात फार्मेसिस्ट मनोज गोस्वामी बताते हैं कि अस्पताल में लंबे अरसे से डॉक्टर समेत स्टाफ की कमी बनी ही हुई है। जो दवाएं मिलती है, उनसे यथासंभव मरीजों का इलाज करते हैं।