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काया अपना साथ जो देती, जीवन तब अभिशाप न होता

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पीलीभीत। एक दौर था जब बुजुर्ग अपने परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक की नजर से देखे जाते थे, लेकिन आधुनिक जीवनशैली और विचारों में भिन्नता आदि के चलते आज की पीढ़ी कई धूप छांव देख चुके इन बुजुर्गों को ही बोझ मानने लगी। शहर के वृद्ध आश्रम में गुजर बसर कर रहे बुजुर्गों को देखकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। खास बात यह है कि कई झंझावतों के बीच यह बुजुर्ग अपने बच्चों की बुराई तो नहीं करते, लेकिन इनकी आंखों से बहते झरने इनकी व्यथा कहने को काफी हैं।
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वृद्ध आश्रम में 16 बुजुर्गों का हैं साझा परिवार
शहर से सटे बरहा में वर्ष 1999 में असहाय व निराश्रित लोगों के लिए वृद्ध आश्रम की स्थापना की गई थी। वृद्ध सेवा संस्थान द्वारा आश्रम का संचालन किया जाता है। वर्तमान में यहां 11 बुजुर्ग महिलाएं और पांच पुरुष रह रहे हैं। महिलाओं व पुरुषों के लिए अलग-अलग रहने की व्यवस्था है। बड़ा सा किचन भी है। जहां सुबह और शाम को नाश्ता और दोनों टाइम का खाना मिलता है। मनोरंजन के लिए अलग-अलग टीवी आदि की व्यवस्था है। खास बात यह है कि यहां रहने वाले बुजुर्ग अपनी-अपनी जिम्मेदारियाें को खुद ही निभाते हैं। आश्रम में खेलकूद प्रतियोगिताएं भी होती है। स्वयंसेवी संगठन और स्कूली बच्चे भी पहुंचकर बुजुर्गों के साथ उनके सुखदुख साझा करते हैं।
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अब बुजुर्ग मुन्नी की आंखों से नहीं बहते आंसू
वृद्ध आश्रम में करीब एक दशक से गुजर बसर कर रही 70 वर्षीया मुन्नी गुप्ता यहां आई तो पति गोपीनाथ के साथ थी, लेकिन पांच साल पहले उनके हाथ से पति का दामन भी छूट गया। बुजुर्ग मुन्नी गुप्ता पहले तो कुछ कहने से कतराई, लेकिन बाद में अतीत को कुरेदते हुए बोली कि परिवार में बेटे-बेटियां हैं। सभी विवाहित हैं। प्रताड़ना से तंग आकर घर छोड़ दिया। तत्कालीन डीएम अजय चौहान ने यहां रखवा दिया। कई बीमारियां से ग्रस्त मुन्नी कहती हैं कि वृद्ध आश्रम ही उनका परिवार है। बेटों ने तो मुंह मोड़ लिया, लेकिन बेटियां आज भी सुख दुख में साथी है। वर्तमान हालात पर बोली कि आजकल कलियुग चल रहा है। औलाद अपना फर्ज ही भूलती जा रही है।
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बेटियों पर बोझ न बनूं इसलिए छोड़ दिया घर
बोलचाल में बेहद स्वाभिमानी से दिखने वाले 85 वर्षीय ओमप्रकाश बरेली के रहने वाले हैं। करीब एक दशक पूर्व वह अपनी पत्नी के साथ यहां रहने आए थे। ओमप्रकाश ने बताया कि पेशे से अध्यापक था, ट्यूशन आदि करके तीन बेटियों का पाला पोसा और उनकी शादियां कर दी। बेटी की शादियों के बाद घर का ख्याल आया तो सोचा किसके लिए घर बनाऊंगा, सो यहां रहने चला आया। करीब दो साल पहले पत्नी गंभीर बीमारी का शिकार हो गई तो एक बेटी उन्हें लेकर चली गई। गठिया व हार्निया से पीड़ित ओमप्रकाश बोले कि पता नहीं कब सांसें रुक जाएं। किसको दोष दूं, किसको दुआ? मैं आज भी मर्यादाएं नहीं भूला। बस बेटियों पर बोझ न बनूं, यही सोचकर आज यहां हूं।
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नदी ने किया बेसहारा, तो सहारा बना आश्रम
पूरनपुर निवासी 65 वर्षीय चंद्रदेव पर दैवीय आपदा कर ऐसा कहर बरपा कि आज पति पत्नी व औलाद सभी जुदा-जुदा है। बेटी की शादी कर दी वहीं पत्नी आज भी गांव में है। आश्रम में सुबह जब उनके घंटा बजाने के बाद इसकी वजह जानने की कोशिश की तो फफक-फफककर रो पड़े। खुद को संभालते हुए बोले कि नदी ने सारी जमीन निगल ली, जैसे तैसे बेटी के हाथ पीले किए। सरकार की ओर से सुविधा मिलती थी, लेकिन आज कुछ भी नहीं है। नाते रिश्तेदारों ने भी मुंह मोड़ लिया। अब तो बस आखिरी सांस का इंतजार है।
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