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150 थारू परिवार बेघर, कौन सुने फरियाद

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थारू - फोटो : अमर उजाला
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हर साल उजड़ना और बसना बन चुकी है नियति
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दो दशक पहले वन महकमे ने उजाड़ा, बाद में दिए गए पट्टे भी किए निरस्त

माधोटांडा। तराई क्षेत्र के नगरिया खुर्दकलां के गांव ढकिया ताल्लुके महाराजपुर की थारू बस्ती अमूमन हर साल की शारदा की बाढ़ से उजड़ती और बसती है। परेशानी यही पर खत्म नहीं होती। यह बस्ती वन भूमि पर बसी होने के चलते यहां कोई विकास कार्य भी नहीं हो पा रहे हैं। चूंकि बस्ती के थारू परिवार एक बड़े इलाके की भूमि पर कब्जा कर खेती कर रहे हैं, इसके चलते उक्त थारू परिवार सरकार की सभी योजनाओं का लाभ उक्त भूमि पर ही चाहते हैं, लेकिन वन भूमि होने के चलते टाइगर रिजर्व प्रशासन इसके लिए राजी नहीं है।
नगरिया खुर्दकलां ग्राम पंचायत का एक गांव शारदा नदी के पार पड़ता है। वर्ष 1989 में इस गांव की समूची आबादी का क्षेत्र और कृषि भूमि का इलाका शारदा नदी की भेंट चढ़ चुका है। उस दौरान यहां बंगाली विस्थापित परिवार बसे थे। हालांकि बाद में शारदा नदी ने इस इलाके की भूमि को छोड़ दिया। तबसे यहां लोग खेती करते आ रहे हैं।
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दो दशक पहले उजाड़े गए थे लग्गाभग्गा से
वर्ष 1997 में लग्गाभग्गा क्षेत्र में बसे थारू जनजाति के परिवार को वन विभाग ने यह कहकर उजाड़ दिया था कि लग्गा भग्गा की समूची भूमि वन विभाग की है। जिसके बाद राजस्व प्रशासन ने इन 45 थारू परिवारों को ढकिया ताल्लुके महाराजपुर में तीन-तीन डिसमिल के आवासीय पट्टे देकर बसाया था। शेष थारू परिवार कटकवारा में बसाए गए, जबकि कुछ खटीमा क्षेत्र में चले गए।

आवासीय पट्टे की जमीन को बता दिया वन भूमि
जब इन परिवारों के 45 आवासीय पट्टे किए गए तो उस दौरान कहा गया कि सभी को इंदिरा आवास समेत अन्य विकास योजनाओं का लाभ दिया जाएगा। इस बीच वन महकमा आड़े आ गया। जल निगम के हैंडपंप भी नहीं लगने दिए गए। थारू परिवारों ने समस्या को लेकर विधायकों से लेकर जिला प्रशासन तक के चक्कर काटे। नतीजा यह निकला कि इंदिरा आवास तो नहीं बनने दिए गए, लेकिन झोपड़ी डालकर रहने की इजाजत दे दी गई।

आरक्षण के चलते थारू जनजाति की महिला बनी प्रधान
ग्राम पंचायत के चुनाव में आरक्षण के चलते बस्ती के फिरुआ राना की पत्नी रामवती राना ग्राम प्रधान बनी। महिला प्रधान ने समस्या को लेकर शासन तक दौड़भाग की। जिसके बाद 58 परिवारों को दो-दो एकड़ कृषि भूमि के पट्टे किए गए। जब इसकी भनक वन विभाग को लगी तो वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए सभी 58 पट्टे साल भर में निरस्त करा दिए।

400 एकड़ भूमि पर हो रही है खेती
थारू परिवारों की आबादी साल दर साल बढ़ती गई। सरकारी महकमों के चक्कर लगाकर थक चुके इन परिवारों ने वनकर्मियों को पटाया और धीरे-धीरे भूमि की जुताई करते गए और आज यहां 400 एकड़ भूमि पर खेती हो रही है। वर्तमान में यहां करीब 150 से अधिक बस चुके हैं।

प्रयासों के बाद 20 इंदिरा आवास ही बन सके
इसके बाद बंगाली महिला चंपा राय ग्राम प्रधान बनी। उन्होंने आवास और शौचालय बनवाने के प्रयास किए। कई बार बराही रेंजर से भी मिली, लेकिन टाइगर रिजर्व प्रशासन ने वहां कोई निर्माण नहीं होने दिया। जिसके बाद थारू परिवारों ने स्वीकृत 20 इंदिरा आवास नदी के इस पार ही बना लिए।

18 साल पहले पहली बार पहुंची पूरी न्याय पालिका
करीब 18 साल पहले पहला ऐसा मौका था, जब कोई जिला जज पूरी न्याय पालिका के साथ थारू बस्ती पहुंचा। उस दौरान थारू बस्ती की आवाज को अमर उजाला ने प्रमुखता से उठाया था। जिसके बाद ही ढकिया ताल्लुके महाराजपुर जिला विधिक साक्षरता शिविर लगाया गया। शिविर जिला जज से समेत न्यायिक और प्रशासनिक अधिकारी शारदा नदी को पार कर पैदल गांव में पहुंचे थे। शिविर के दौरान वन विभाग द्वारा दर्ज किए गए मुकदमों का निस्तारण करने की कवायद शुरू हुई। इसके बाद सभी मुकदमे समाप्त कर दिए गए।

गरीबी व अंधविश्वास के चलते किया धर्म परिवर्तन
थारू जनजाति के परिवार अपनी अलग ही बस्ती बनाकर रहना पसंद करते हैं। यहीं वजह है कि बस्ती के लोग अपने कब्जे वाली भूमि पर अपने मकान, स्कूल व अन्य सुविधाओं की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन वन महकमा इसमें रोड़ा बना हुआ है। गरीबी का यह आलम रहा कि करीब सात आठ साल पहले गरीबी व अंधविश्वास के चलते नेपाल के एक पादरी ने गांव आकर करीब सात परिवारों का धर्म परिवर्तन करा दिया। जिसको लेकर पुलिस व प्रशासनिक अमला भी पहुंचा था।

यह है बस्ती वासियों का दर्द:
मुश्किल से मिली फसल बोने की इजाजत
मेरे कार्यकाल में बीस इंदिरा आवास मिले हैं। करीब 40 शौचालयों की सूची भेज रखी है। वन विभाग अब फिर उजाड़ने की योजना बना रहा है। डीएफओ से भी मिली थी। उनसे संयुक्त सीमांकन की बात की थी और यदि सीमांकन में वन भूमि नहीं तो छोड़ने की बात कही। तब बड़ी मुश्किल से फसल बोने की इजाजत दी गई।
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चंपा राय, ग्राम प्रधान, नगरिया खुर्दकलां

सरकार बनवाए आवास व स्कूल
गांव के अधिकतर युवा बाहर मजदूरी कर रहे हैं। बच्चे शारदा नदी पार जाकर पढ़ाई करते हैं। इसके एवज में नाव वालों को खाद्यान्न देना पड़ता है या फिर उसके बराबर रकम। पेट पालने को मजदूरी के साथ चटाई बनाकर बेचते हैं तब बच्चों को पेट पलता है। बस्ती में आवास, शौचालय, स्कूल बने तो हम भी अन्य लोगों की तरह जी सकेेंगे।
राधे राना, ग्राम पंचायत सदस्य, ढकिया ताल्लुके महाराजपुर
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