पीलीभीत। प्रदेश का बजट पास होने के बाद पीलीभीत टाइगर रिजर्व के हाथ मायूसी लगी है। वैसे आजादी के बाद से अब तक यहां के जंगल का अनुकूल वातावरण का इतिहास रहा है कि बजट में ढिलाई और संसाधनों की कमी के बावजूद बाघों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। टाइगर रिजर्व हो जाने के बाद जनपद वासियों और वन्यजीव प्रेमियों को यह उम्मीद जागी थी कि अन्य नेशनल पार्कों की तरह संसाधन दिए जाएंगे और बाघों का संरक्षण भी होगा, लेकिन न तो पर्यटन को बढ़ावा मिला और न ही बाघों के संरक्षण के लिए बजट में कोई इजाफा दिखाई दिया। गत वर्ष खुद सीएम चूका बीच की खूबसूरती देख पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ बाघों के संरक्षण पर भी जोर दे गए थे। ऐसे में बजट न मिलना टाइगर रिजर्व के लिए दुर्भाग्य की बात है।
बजट दिलाने में सांसद भी नहीं हो सकी सफल
जिले की सांसद मेनका गांधी वन और वन्यजीवों के मामले में हमेशा सख्त रही है, लेकिन प्रदेश सरकार से ही पीलीभीत के जंगल को बजट दिलाने में वह सफल नहीं हो सकी है। यही वजह है कि प्रदेश सरकार ने पीटीआर को बजट में कही शामिल नहीं किया है। इससे लोगों में मायूसी भी देखने को मिली।
पर्यटन बढ़ाने को सीएम खुद दे गए थे निर्देश
गत वर्ष प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ का जनपद दौरा हुआ था। जिसपर तत्कालीन डीएम डीएम शीतल वर्मा के आग्रह के बाद सीएम महोफ रेंज के कोर एरिया में स्थित चूका बीच भी गए थे। चूका बीच की खूबसूरती को देखकर खुश हुए। जंगलों की तारीफ करते हुए सीएम ने खुद इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के प्रशासनिक और वनाधिकारियों को निर्देश दिए थे। उन्होंने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रोजेक्ट बनाकर भेजने के निर्देश दिए थे। वहीं बाघों के संरक्षण पर भी विशेष जोर दिया। जिसके बाद ऐसा माना जा रहा था कि शायद पीटीआर भी अन्य नेशनल पार्कों की तर्ज पर बदल जाएगा, लेकिन सब ठंड बस्ते में दिखाई दिया।
टाइगर सफारी, रेस्क्यू सेंटर व गैंडा परियोजना हो गई गुम
सीएम के दौर के बाद अधिकारियों ने काफी तेजी दिखाई। वन विभाग के आला अधिकारियों ने टाइगर सफारी को विकसित करने की योजना बनाकर स्थान चिह्नित करने के लिए सर्वे भी शुरू किया। चिह्नित क्षेत्र में चल रहे अतिक्रमण को हटाने के लिए अभियान भी चलाए गए, लेकिन नतीजा शून्य ही दिखाई दिया। वहीं इको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए पूर्व में गैंडा परियोजना के लिए सर्वे शुरू किया गया। हालांकि गैंडों के मामले में जंगल का वातावरण अनुकूल है। नेपाल की शुक्ला फांटा सेंचुरी के गैंडे भी यहां आकर कई दिन तक रुकते है। जिसके चलते गैंडा परियोजना के लिए सर्वे कर प्रोजेक्ट शासन को भेजा गया, लेकिन यह परियोजना भी ठंडे बस्ते में चली गई।
नहीं खुल सका टाइगर रेस्क्यू सेंटर
टाइगर रिजर्व में बढ़ रहे बाघ समेत अन्य वन्यजीवों की संख्या को देखते हुए सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं थे। वहीं पूर्व में बीमारी से बाघों की मौत व घायल होने की घटनाएं बड़ी तो अफसर गंभीर हुए। इसके बाद टाइगर रिजर्व में एक टाइगर रेस्क्यू सेंटर बनाने की योजना पर अमल शुरू किया गया, लेकिन वह भी सफेद हाथी साबित हुई।
चूका बीच के भी नहीं संवर सके दिन
सीएम के दौरे के बाद जहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए तेजी तो जरूर दिखी गई, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हो सका है। चूका बीच में नई हटों को विकसित करने के दावे किए जाने लगे। हालांकि इसके लिए मुंबई व दिल्ली टीम ने चूका बीच पहुंचकर जायजा लिया, लेकिन सब ठंडे बस्ते में ही दिखाई दिया। सैलानियों की व्यवस्था के लिए मात्र पांच टाटा जीनान वाहन संचालित कर दिए गए। वन निगम की ओर से लाई गई मोटरबोट भी संचालित नहीं हो सकी है।