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टाइगर रिजर्व को अतिक्रमण मुक्त कराने में अफसर नाकाम

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टाइगर रिजर्व को अतिक्रमण मुक्त कराने में अफसर नाकाम
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स्थानीय स्तर पर सिर्फ बयानबाजी, दुधवा प्रबंधन ने निकाला समाधान
10 से अधिक गांवों में जंगल की जगह पर बसी आबादी, लहलहा रहीं फसलें
अमर उजाला ब्यूरो
माधोटांडा (पीलीभीत)। दुधवा नेशनल पार्क ने जंगल के बीच बसे गांवों को बाहर बसाने की कवायद शुरू कर दी है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व भी लगभग ऐसी ही समस्या से बरसों से जूझ रहा है। जंगल के बीच या सटी हुई बस्तियों में अक्सर जंगली जानवरों की आवाजाही और मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं हो रही हैं। नए हालात में लोगों को उम्मीद है कि दुधवा की तर्ज पर टाइगर रिजर्व प्रशासन भी वर्षों से कोर एरिया की भूमि पर हुए अतिक्रमण हटाने की कोई ऐसी लुभावनी मुहिम शुरू करेगा जिससे टाइगर रिजर्व का सिकुड़ा दायरा पांच दशक पूर्व की तरह हरियाली से भरपूर हो जाएगा। बल्कि बाघ एवं तेंदुए सहित अन्य वन्यजीव भी स्वच्छंद विचरण कर सकेंगे।
अतिक्रमण के चलते टाइगर रिजर्व का काफी एरिया सिकुड़ा हुआ है। इसके पीछे मात्र जनता ही नहीं बल्कि वन महकमे का भी दोष है। वजह यह है कि जब पूर्वांचल के लोग व बंगाली विस्थापितों के आने का सिलसिला शुरू हुआ तो उन्होंने ऐसे इलाकों पर ही कब्जे करने शुरू किए। खास बात यह रही कि वन अफसरों की उदासीनता के चलते राजस्व अभिलेखों में भी वन भूमि के नक्शों एवं गाटा संख्या का मिलान नहीं कराया गया। बहुत से क्षेत्रों में राजस्व अभिलेखों में विवाद बना रहा। इसका फायदा उठाकर अतिक्रमणकारियों ने कोर एरिया के एक बड़े रकबे पर अतिक्रमण कर लिया। खास बात यह रही कि वनकर्मियों ने भी वारे न्यारे कर अतिक्रमणकारियों का साथ दिया।
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बराही रेंज के कई इलाकों में है कब्जा
बराही जंगल से सटे बंदरभोज, बूंदीभूड़, नौजल्हा नकटा, रमनगरा, ढकिया ताल्लुके महाराजपुर, गुन्हान, राजपुर ताल्लुके महाराजपुर,फैजुल्लागंज, बरुआ कुठारा समेत कई ऐसे इलाके हैं, जहां पर सालों से वन विभाग की जगह पर अवैध कब्जा है। यहां न सिर्फ आबादी बस चुकी है, बल्कि जंगल की जमीन पर अतिक्रमणकारियों की फसलें भी लहलहा रही हैं।
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कार्रवाई के नाम पर हुई खानापूर्ति
अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई करने के लिए बयान तो अफसर देते रहते हैं। पूर्व में कई बार इसको लेकर शुरूआत भी की गई थी पर इसका नतीजा नहीं निकल सका। तमाम प्रयास खानापूर्ति में सिमट कर रह गए। वहीं विरोध और राजनीतिक दबाव के चलते वन विभाग को बैकफुट पर आना पड़ा।
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वर्ष 1999 में एक बड़े रकबे का हुआ था अमलदरामद
बराही रेंज के यह इलाके वर्ष 1999 में तो राजस्व अभिलेखों में वन विभाग दर्ज था पर अमलदरामद नहीं हुआ था। इस कारण तत्कालीन डीएम मनोज कुमार सिंह ने एक अभियान चलाकर बड़े रकबे को राजस्व अभिलेखों में अमलदरामद करा दिया था, लेकिन तब तक कई इलाकों में बंगाली विस्थापितों व पूर्वांचल से आए लोगों की कालोनियां व दुकान बस चुकी थी।
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तो क्या अब दुधवा की तर्ज पर यहां भी होगी कोई पहल
लखीमपुर के दुधवा टाइगर रिजर्व के अधिकारियों ने अपने कोर एरिया में बसे अतिक्रमणकारियों को वहां से हटाने की एक लुभावनी मुहिम की शुरुआत की है। माना जा रहा है कि ऐसी शुरुआत टाइगर रिजर्व प्रशासन भी कर सकता है। यदि ऐसा प्रयास हुआ तो टाइगर रिजर्व का सिकुड़ा दायरा फिर से फैल सकता है, और वहां पर बसे अवैध कब्जेदारों को दूसरी जगह पुनर्वास की व्यवस्था के साथ पात्रों को रोजगार व व्यापार से जोड़ा जा सकता है। हालांकि अफसर अभी भी इस बारे में कुछ कहने से बच रहे हैं।
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वर्जन
टाइगर रिजर्व की काफी जमीन पर अवैध कब्जे हैं। समय-समय पर विभाग इस मामले में केस काटता रहता है तो कब्जेदारों पर मुकदमे भी दर्ज हुए हैं। लगता है कि संयुक्त सीमांकन न होने तक यह समस्याएं बनी रहेंगी।- एच. राजामोहन, फील्ड डायरेक्टर, पीलीभीत टाइगर रिजर्व
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