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परीक्षा न सही.. हॉकी के खेल में तो टॉपर हैं सिमरनजीत

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पीलीभीत। अंतर्राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी सिमरनजीत सिंह अपने विद्यार्थी जीवन में कभी टॉपर नहीं रहे, लेकिन फिर भी पढ़ने से कभी जी नहीं चुराया। खेल के प्रति दिलचस्पी ने उन्हें कक्षा पांच में पढ़ाई के दौरान ही हाथों में हॉकी स्टिक पकड़ा दी। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और लगन की बदौलत ही उन्होंने अपनी पहचान भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा बनकर बनाई। महज 23 वर्ष के सिमरनजीत को गांव से निकलकर अंतर्राष्ट्रीय हाकी टीम का हिस्सा बनने के सफर के दौरान कई मुश्किलें भी सामने आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और कठिन परिश्रम से वह मंजिल पा ली जिसकी उन्हें तलाश थी। परीक्षा में टॉपर बनने की होड़ पर उनका क्या नजरिया है, उनसे हमने उनके अनुभवों को जाना, जिसे हम आपके साथ साझा कर रहे हैं।
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सफलता के लिए टॉपर बनना जरूरी नहीं, लक्ष्य पर करें फोकस
मेरा मानना है कि जीवन में शिक्षा बेहद जरूरी है। हर किसी को पढ़ना लिखना चाहिए और अच्छे मॉर्क्स लाने का प्रयास भी करना चाहिए, लेकिन इसके लिए आपको लक्ष्य तय करने की जरूरत होती है। बिना लक्ष्य के कोई भी मंजिल नहीं पाई जा सकती है। यदि आप पढ़ाई में बेहतर मॉर्क्स नहीं ला पाते हैं तो इसे असफलता मानकर निराश होने की जरूरत नहीं है। कहते हैं कि असफलता ही सफलता की सीढी होती है। अपने लक्ष्य पर पुन: फोकस कर आगे बढ़ें। जब मुझे हॉकी स्टिक से लगाव हुआ और मैंने इसे अपनी जिंदगी का लक्ष्य बनाया तो उस दौरान कई लोगों ने इसे गलत कदम बताया। अक्सर सुनता था कि पढ़ोगे, लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे, कूदोगे तो होगे खराब। हालांकि ये शब्द मुझे किसी जहर से कम नहीं लगते थे, लेकिन मैंने अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं हटने दिया। अपने विद्यार्थी जीवन में मझोला से लेकर पंजाब के बटाला, जालंधर और छत्तीसगढ़ में भी पढ़ाई की, लेकिन हॉकी का साथ नहीं छोड़ा और आज लक्ष्य को मजबूती से पकड़े रहने की बदौलत मैंने मुकाम हासिल कर ही लिया। पढ़ाई हो या खेल या फिर कोई और क्षेत्र, लक्ष्य पर फोकस करना बेहद जरूरी है और इसे तब तक मजबूती से पकड़े रहना है, जब तक मंजिल न पा लें। - सिमरनजीत सिंह, अंतर्राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी।
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