पीलीभीत। मोदी सरकार एक फरवरी को अंतरिम बजट पेश करने जा रही है। इस बजट से उद्योग, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा समेत मध्यम वर्ग आदि को खासी उम्मीदें हैं। वहीं सरकार ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10 फीसदी का आरक्षण रखा है। इसका सालाना आठ लाख रुपये से कम आय वाला इसका फायदा उठा सकते हैं। ऐसे में लोगों को उम्मीद है कि सरकार इनकम टैक्स छूट लिमिट भी बढ़ा सकती है। जानकारों की मानें तो चुनावी साल होने के कारण इस साल इस बजट में कुछ खास घोषणाएं हो सकती हैं।
उद्योग-धंधे: मोदी सरकार के मौजूदा कार्यकाल के आखिरी बजट से उद्योग जगत को काफी उम्मीदें हैं। जिले के उद्योग धंधों पर नजर डाली जाए तो यहां करीब 110 राइस मिलें, 10 से अधिक फ्लोर मिल समेत तीन प्राइवेट चीनी मिलें हैं। इन उद्योगों से जुड़े कारोबारियों की मानें तो जिले का उद्योग जगत पिछले दो दशक से कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर सका है। प्रदेश में कृषि क्षेत्र में अग्रणी माने जाने वाले इस जिले में इंडस्ट्रियल पार्क न होने और उद्योगों को प्रोत्साहन न मिलने से जो दशा 20 साल पहले थे, आज भी वहीं है। कारोबारियों को उम्मीद है कि चुनावी साल होने के नाते बजट में इंडस्ट्रियल सेक्टर को कुछ तो राहत मिलेगी।
कृषि: डेढ़ गुना समर्थन मूल्य के साथ मिले अनुदान, तभी लौटेगी अन्नदाताओं की मुस्कान
जिले में 2.32 लाख किसानों द्वारा 2.30 लाख हेक्टेयर जमींन पर खेती की जा रही है। इस 2.30 लाख हेक्टयेर में करीब एक लाख हेक्टेयर में सिर्फ गन्ने की खेती की जाती है, जबकि शेष बचे 1.30 लाख हेक्टेयर में गेहूं, धान के अलावा अन्य फसलें की जाती हैं, लेकिन मौसम की मार के चलते किसानों को लगभग हर साल की नुकसान उठाना पड़ता है। वहीं जिले के कुछ किसानों को हर साल ही बाढ़ का दंश भी झेलना पड़ता है। जिले के किसानों का कहना है कि सरकार कृषि क्षेत्र में संचालित योजनाओं का धरातल पर क्रियान्वयन कराने के साथ किसानों के सभी कर्ज माफ करें और लागत से डेढ़ गुना फसल का समर्थन मूल्य दे। साथ ही किसानों को कर्ज के बोझ से न दबना पड़े, इसके लिए सरकार प्रति एकड़ के हिसाब से अनुदान दें।
चिकित्सा: दवाओं और उपकरणों के लिए विदेशी निभर्रता कम हो तो बने बात
चिकित्सा क्षेत्र में मरीजों को सस्ता इलाज मिले, इसके लिए सरकार को दवाओं और मेडिकल उपकरणों के लिए विदेशी निर्भरता कम करनी होगी। जिले में करीब 30 से अधिक बड़े अस्पताल और नर्सिंग होम हैं। इनमें से अधिकांश अस्पतालों में रोग विशेषज्ञों के साथ अत्याधुनिक इलाज की सुविधाएं भी हैं। इन सबके बावजूद अधिकांश सीरियस केसों में डॉक्टर मरीजों को महानगर के अस्पतालों में रेफर कर देते हैं। इसकी वजह सुरक्षा न होना। डॉक्टरों के मुताबिक कुछ सीरियस केसों में इलाज के दौरान मरीज की मौत हो जाती है। ऐसे केसों में इलाज में लापरवाही न होने के बावजूद मरीज का परिवार डॉक्टर को ही दोषी मानते हुए अस्पतालों में तोड़फोड़ कर देता है। सरकार को चाहिए कि डॉक्टर और अस्पताल की सुरक्षा को कड़े कानून बनाएं। अन्य क्षेत्रों की तरह मेडिकल सेक्टर में भी अस्पताल या नर्सिंगहोम बनाने पर सरकार प्रोत्साहन देने के साथ ब्याज में छूट की सीमा बढ़ाए। तभी मरीजों को सस्ता इलाज मिल सकेगा।