पीलीभीत। जिले में टीबी रोग के करीब चार हजार मरीज हैं। यानी केंद्र सरकार द्वारा हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद टीबी के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। जागरूकता की कमी और लापरवाही के चलते साल दर साल टीबी रोगी बढ़ रहे हैं। यह आलम तब है, जब टीबी मरीजों की जांच पड़ताल और उनके बेहतर इलाज को हर साल दो से तीन बार घर-घर जाकर टीबी मरीजों को चिह्नित करने के लिए अभियान चलाया जाता है।
देश में 2025 तक टीबी को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य है। इसके लिए टीबी रोगियों के बेहतर इलाज के लिए केंद्र सरकार हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। टीबी की पुष्टि होने पर प्रत्येक मरीज को पांच सौ रुपये प्रति माह दिए जाने के साथ ही डॉट्स की दवाएं भी मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं। इस कवायद के बावजूद जिले में टीबी मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो तीन साल में 18 लाख से अधिक पीड़ितों की जांच की गई। इनमें 7,586 में टीबी के लक्षण मिले, जिनमें वर्तमान में तीन हजार का इलाज चल रहा है। इनमें 127 एमडीआर के मरीज हैं जिन पर मौत का खतरा मंडरा रहा है। इसके अलावा निजी अस्पतालों में करीब एक हजार मरीजों को इलाज चल रहा है।
एमडीआर मरीज अपने आसपास मरीजों की पूरी चेन बना देते हैं। उसके संपर्क में अधिक वक्त तक रहने वाले सामान्य लोग भी एमडीआर केस में तब्दील हो जाते है। एमडीआर मरीजों में रेसिस्टेंस टीबी बैक्टीरिया देता है। ऐसे मरीजों में इंफेक्शन के जरिए दूसरे लोग भी टीबी के शिकार हो जाते हैं। लोगों में जागरूकता की कमी है। टीबी रोगी को नियमित इलाज कराना चाहिए। - डॉ. राजेश भट्ट, जिला क्षय रोग विशेषज्ञ