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बापू छात्रावास मामले की अगली सुनवाई पांच नवंबर को

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बापू छात्रावास मामले की अगली सुनवाई पांच नवंबर को
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सरकार की ओर से वकील ने कोर्ट में रखा अपना पक्ष
अमर उजाला ब्यूरो
पीलीभीत। बापू छात्रावास मामले में सिविल जज त्वरित न्यायालय सुनील कुमार की अदालत में अगली सुनवाई पांच नवंबर को होगी। मंगलवार को सरकार की ओर से न्यायालय में अपना पक्ष रखा गया।
सिविल जज की अदालत में नंद किशोर, मोहित कुमार, नागेंद्र सिंह, देवेश गौतम, सतीश कुमार की ओर से 24 अक्तूबर को मुकदमा दायर किया गया। जिसमें कहा गया कि वे बापू छात्रावास के छात्र हैं। वर्ष 1965 में शेख छोटे के पूर्वजों ने तत्कालीन विधायक को यह छात्रावास दलित छात्रों के अध्ययन व निवास के लिए दिया था। जलकर और गृहकर शेख छोटे व उनके परिवारीजन देते थे। इसकी रखरखाव की व्यवस्था शासन द्वारा जिला समाज कल्याण एवं समाज के संभ्रात व्यक्तियों द्वारा की जाती रही है। छात्रावास के छात्रों को छात्रवृत्ति, बिजली बिल, पानी, फर्नीचर, किताबें, रोजगार व भवन की मरम्मत व्यवस्था जिला समाज कल्याण विभाग कराता रहा है। कुछ समय से भूमाफिया के प्रभाव के कारण यह व्यवस्थाएं बंद करा दी गईं। न्यायालय में कहा गया कि प्रतिवादी गण जबरन बलपूर्वक बगैर किसी अधिकार के छात्रों को छात्रावास से बेदखल करना चाहते हैं। इस पर रोक लगाई जाए।
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कोर्ट ने प्रतिवादीगण को सुने बगैर छात्रों के पक्ष में कोई आदेश जारी नहीं किया था। सुनवाई के लिए 30 अक्तूबर की तारीख लगाई गई। मंगलवार को प्रशासन की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता राजस्व प्रशांत यादव ने सरकारी पक्ष रखा और मामले को निरस्त करने की बात कही। सिविल जज त्वरित न्यायालय सुनील कुमार की अदालत में सुनवाई की अगली तारीख पांच नवंबर लगाई गई है। याचिका दायर करने वाले छात्रों के पक्ष में कोई आदेश नहीं हुआ है।
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डीजीसी सिविल के बगैर हो रही है कोर्ट में सरकारी पैरवी
पीलीभीत। डीजीसी सिविल मंगलसेन गंगवार अगस्त 2017 में सेवानिवृत हो गए। सरकार ने नया डीजीसी बनाने को आवेदन भी मांगे थे। दो माह पहले प्रदेश शासन ने नया डीजीसी सिविल नामित करने के लिए आदेश भी भेजा था, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही के चलते जिले में बीते 14 महीने से कोई भी डीजीसी सिविल नहीं है। जिला शासकीय अधिवक्ता राजस्व प्रशांत यादव को राजस्व के साथ ही मजबूरन दीवानी मामलों में भी सरकारी पक्ष की पैरवी करनी पड़ रही है। बापू छात्रावास जैसे गंभीर मामले में भी डीजीसी सिविल के बगैर ही सरकारी पक्ष न्यायालय में रखा जा रहा है। 14 माह से डीजीसी सिविल का पद रिक्त होने और कोई नई नियुक्ति न होने को लेकर कचहरी में तरह-तरह की चर्चाएं हैं।
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