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एक चप्पल, अधजली कॉलर और पैंट के साथ जली खाल!

Sat, 19 Apr 2014 03:20 PM IST
दिनेश जुयाल/अमर उजाला, बरेली
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देवचरा मतदान केंद्र के अंदर स्कूल कैंपस में मेन गेट से करीब 25 मीटर दूर हरिसिंह की एक चप्पल, कॉलर का अधजला टुकड़ा और पैंट के साथ जली हुई खाल 30 घंटे के बाद भी वहीं पड़ी रही। शुक्रवार सुबह की बारिश भी इसे बहा नहीं पाई।
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थानेदार जीएल यादव कह रहे हैं कि घटनास्थल सड़क पर है तो इसे ही सरकारी सच मानना पड़ेगा। पीपल का पेड़ गवाही नहीं दे सकता कि सारे बीएलओ यहीं पर बैठे थे। यहीं दो बार हरिसिंह की तकरार हुई।

आंवला संसदीय क्षेत्र के देवचरा गांव में वोट डालने से रोकने पर गुस्साए मजदूर हरि सिंह ने गुरुवार को आग लगाकर जान दे दी। बीएलओ ने स्वीकार किया कि उन्हें दूसरी पर्ची बनाने में कुछ देर हुई, क्योंकि वो मसरूफ थे। दूसरी ओर प्रशासन हरि को शराबी और मानसिक रूप से पीड़ित बता रहा है।
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चपरासी को सब पता, पर गवाही नहीं देगा

अब जब हरि की बात हो रही है, तो उस जगह का जिक्र जरूरी हो जाता है जहां यह बदकिस्मत घटना ने अंजाम लिया। यहीं पर आग लगा कर वह बायीं तरफ काफी दूर तक भाग कर जमीन पर गिर गया था।

स्कूल के चपरासी महेश को सब पता है। हमें उसने बताया भी लेकिन गवाही में वह कहेगा कि उस समय तो पानी पिलाने गया था। आग बुझाने के नाम पर अखबार से फटका मारने वाला दारोगा कुछ नहीं कहेगा।

प्रशासन ने अपनी त्वरित रिपोर्ट में उसे पागल और शराबी तक करार दे दिया तो हरिसिंह प्रतिवाद नहीं करेगा। उसे तो बृहस्पतिवार की रात ही आनन-फानन में जला दिया। एक गरीब उस पर भी जाटव मजदूर खुद जल कर मर गया किसको फर्क पड़ता है? फर्क पड़ता जो लोकतंत्र के महापर्व पर कोई दाग लगता, आधिकारिक तौर पर यह घोषित कर दिया कि ऐसा नहीं हुआ। अब किसी बात से क्या फर्क पड़ता है।

हरि के घर मातम का माहौल

नई बस्ती में कीचड़ का रास्ता पार कर एक अधबने मकान के पास हरिसिंह की फूस की झोपड़ी के बाहर उसकी मां-बीवी और पांच बच्चों को दिलासा देने बस्ती की कुछ महिलाएं बैठी हैं।

यही वे लोग बचे हैं जिन्हें इस मौत से फर्क पड़ता है। हरिसिंह को जानने वाले उसको पागल और शराबी कहे जाने को सरकारी बेहयाई की मिसाल मानते हैं। कहते हैं, जो पेट मुश्किल से भर पाता हो वह शराब कहां से पीएगा।

दिमागी रूप से सारे ही गरीब कमजोर होते हैं, बड़ा दिमाग होता तो बाबू साब नहीं होता। हरि के पांच बच्चों का कच्चा परिवार है, कभी बीवी पर झुंझलाहट तो निकालता ही होगा। यह कल्पना कर एसडीएम ने लिख दिया गया कि वह पत्नी से झगड़ कर आया था। हरि का विसरा सुरक्षित कर लिया गया है, इसमें गंदा पानी बताया गया है। जांच रिपोर्ट आ भी गई तो जैसी चाहें मिल जाएगी।

...शायद मरना नहीं चाहा होगा

हरि के मामा बामसेफ से जुड़े हैं। शायद यही वजह थी कि यह जरी कारीगर बसपा को वोट देने के लिए जयपुर से यहां आया था। यकीनन उसने दबाव बनाने के लिए आत्मदाह का प्रयास किया लेकिन मरना तो उसने भी नहीं चाहा होगा।

बीएलओ से पहली बार हुए झगड़े की बात हरि की पत्नी वीरवती ने भी कही। तब वह भी साथ में थी। गांव वाले पुष्टि करते हैं कि पर्ची कई और लोगों को भी नहीं दी गई थी।

लेकिन प्रशासन का इस पर ज्यादा जोर है कि बीएलओ की भूमिका सामने न आए वरना मामला चुनाव से जुड़ जाएगा। वीरवती की तहरीर को एसओ पहले ही झूठा बता रहे हैं। कहते हैं लोग कुछ भी लिखें-कहें सच वही माना जाएगा जो हमारा आईओ लिखेगा।

बसपा विधायक घर पहुंचे

हरि जैसे वोटरों के मरने पर बसपा को शायद फर्क पड़ता है इसलिए बृहस्पतिवार की रात बसपा विधायक सुनोद शाक्य यहां पहुंचे थे। गांव के प्रधान गुप्ता जी हरि के घर नहीं पहुंचे। वह शायद उनका वोटर नहीं है इसलिए उसका न बीपीएल कार्ड बना है और न इंदिरा आवास के लिए उसे पात्र माना गया।

हरि के परिवार की कुल पूंजी है, 10 गुणा आठ की झोपड़ी, एक कोने पर कुछ सूखी लकड़ियां, कुछ गत्ते के डिब्बे, एक लकड़ी का बक्सा और तीन खटिया। खाना घर के बाहर खुले में पकता है। कोई दरवाजा नहीं। एक टाट लटक रहा है।
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पड़ोस कब तक करेगा चिंता

बड़े बेटे तेरह साल के अनितेश को कभी-कभार शादी-ब्याह में काम मिल जाता है। उसका नाम पांचवी कक्षा में लिखाया गया है। प्रतीक्षा, अतुल और संजना तीनों कक्षा तीन में बैठती हैं और छह साल की स्वाति आंगनबाड़ी में।

ये मिड डे मील खाने वाले बच्चे हैं। इतना गरीब आदमी मर गया, किसे फर्क पड़ेगा। मतदान प्रक्रिया पर दाग लगने से बच जाए ये चिंता किसी की हो सकती है लेकिन एक विधवा, पांच अनाथ बच्चे और बूढ़ी बेसहारा मां इनकी चिंता पड़ोस के लोग कब तक कर पाएंगे, पता नहीं। कह रहे थे इन्हें अनाथालय भिजवाने की व्यवस्था करवा दीजिए, हुजूर।
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