मुस्लिम शरिया कानून देश के आपराधिक कानून से ऊपर नहीं है। नाबालिग के अपहरण व दुष्कर्म मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए जिला अदालत ने यह टिप्पणी की है।
आरोपी ने शरिया कानून का हवाला देते हुए जमानत मांगी थी। मामले की पीड़िता व आरोपी एक ही धर्म से हैं। मामला बाहरी दिल्ली के सुल्तानपुरी इलाके का है।
रोहिणी जिला अदालत ने आरोपी वसीम की याचिका खारिज करते हुए कहा कि देश का कानून सभी पर एक समान लागू होना चाहिए।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. कामिनी लाउ ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी और पीड़िता मुस्लिम हैं और शरिया कानून के तहत शादी के लिए अलग उम्र तय की गई है, महज इस आधार पर आरोपी को देश के कानून में अलग तवज्जो नहीं दी जा सकती।
बता दें कि शरिया कानून में लड़की रजस्वला होने पर अपनी इच्छा से शादी करने के लिए स्वतंत्र है और उसकी सहमति को जायज माना गया है।
अदालत ने कानूनी स्थिति साफ करते हुए कहा कि संविधान के अंतर्गत देश का कानून धर्म निरपेक्षता पर आधारित है और मुस्लिम लॉ इससे ऊपर नहीं हो सकता।
मुस्लिम लॉ केवल शादी विवाह, तलाक व निजी संबंधों के मामलों में लागू होता है, लेकिन आपराधिक मामलों में इसे लागू नहीं किया जा सकता।
जमानत याचिका पर बहस के दौरान आरोपी का तर्क था कि पीड़िता उससे प्रेम करती है और दोनों शादी करना चाहते थे। लड़की के माता पिता को यह रिश्ता मंजूर नहीं था।
इस कारण लड़की उसके साथ अपनी मर्जी से जयपुर चली गई थी। आरोपी ने माना कि वहां पर दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने। इसके बाद लड़की अपने घर वापस आ गई।
आरोपी ने यह भी कहा कि पीड़िता ने अपने घरवालों के दवाव में उसके खिलाफ पुलिस को बयान दिया था। अब दोनों परिवारों के बीच सुलह हो गई है और उन दोनों की शादी के लिए तैयार हैं।
पुलिस ने आरोपी को अपहरण व दुष्कर्म और पोक्सो के तहत गिरफ्तार किया था।
अदालत ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने बयान में साफ तौर पर कहा है कि आरोपी उसे लेकर जयपुर गया था।
वहां पर पर साथ रहे जहां आरोपी ने उससे दुष्कर्म किया।