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माता-पिता की सेवा से बड़ाकोई पुण्य नहीं: विद्यार्थी

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- ऋग्वेद यज्ञ में राष्ट्र कल्याण के लिए दी गईं आहुतियां
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संवाद न्यूज एजेंसी
मुजफ्फरनगर। ऋग्वेद यज्ञ में राष्ट्र कल्याण, सुख, शांति और समृद्धि के लिए आहुतियां अर्पित की गई। उपदेशक कुलदीप विद्यार्थी ने कहा कि वेदानुकूल आचरण से विश्व में सनातन संस्कृति का गौरव बढ़ेगा। माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा से बड़ा कोई पुण्य नहीं है।
गांधी कॉलोनी में आयोजित ऋग्वेद यज्ञ के दूसरे दिन मुख्य वक्ता कुलदीप विद्यार्थी ने कहा कि ऋषि-मुनियों ने वेदों के ज्ञान को शिष्य परंपरा से जीवित रखा था। शिष्य वेदों को सुनकर याद रखते थे। इसीलिए वेदों को श्रुति भी कहा गया है। जीवित माता-पिता की सेवा करने को श्राद्ध तर्पण कहते हैं। श्राद्ध का अर्थ है, श्रद्धा पूर्वक सेवा करना। लखनऊ से पधारी वेदाचार्य डॉ. निष्ठा वेदालंकार ने कहा कि मृत्यु के समय व्यक्ति का मित्र केवल दान है। वेदों का संदेश है कि पुरुषार्थ से कमाए और अच्छे व शुभ कार्यों में सामर्थ्य के अनुरूप दान करें। परोपकार की भावना से किया दान सबसे बड़ा पुण्य है। पात्र और कुपात्र को ध्यान में रखकर ही दान करें। वेदों के आधरित सिद्धांत, परम्पराएं और संस्कृति ही सनातन है।
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स्वामी योगानंद ने कहा कि ऋषि दयानंद के समाज सुधार आंदोलन को आगे बढ़ाए। वैदिक संस्कार चेतना अभियान संयोजक आचार्य गुरुदत्त आर्य ने वैदिक संस्कृति की विशिष्ट सेवाओं के लिए बिजनौर से आए कुलदीप विद्यार्थी को शॉल और सम्मान राशि भेंट कर अभिनंदन किया। यज्ञ में यज्ञमान अशोक जाखड़ एवं निशा जाखड़ रही। वेदपाठ हेमलता एवं अपाला आर्या ने किया। यज्ञ में शुकदेव आश्रम ट्रस्ट सचिव देवराज पंवार, आनंद पाल सिंह आर्य, आरपी शर्मा, मंगत सिंह आर्य, योगेश्वर दयाल, सुधीर कुमार, पूर्व प्रधानाचार्य विजय कुश, डॉ. नीरज शास्त्री, राकेश ढिंगरा आदि ने आहुति दी। संयोजक गजेंद्र सिंह राणा और सत्यजीत राणा ने अतिथियों का आभार जताया।
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