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नहीं डिगे थे बेहड़ा थ्रू के सेनानियों ने कदम

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भोपा क्षेत्र के गांव बेहड़ा थ्रू में स्वतंत्रता सेनानी हुकुम सिंह के स्मृति पत्र दिखाते पुत्र ध? - फोटो : MUZAFFARNAGAR
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भोपा। आजादी आंदोलन में बेहड़ा थ्रू गांव के स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष और देशभक्ति की मिसाल पेश की थी। जोशीले हरदम सिंह को जिले का ‘गांधी’ पुकारा जाने लगा था। उन्होंने कोड़े सहे, जुर्माना भरा, जेल काटी, मगर उनके कदम कभी डिगे नहीं थे।
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बेहड़ा थ्रू गांव स्वतंत्रता संग्राम में फिरंगियों के खिलाफ मुखर था। गांधीवादी हरदम सिंह पुत्र गोधू सिंह उच्च शिक्षित थे। 18 जनवरी, 1932 को उन्हें सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान चार माह और 20 रुपया जुर्माना की सजा मिली। व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए गिरफ्तार हुए तथा सात अप्रैल, 1941 को एक साल की सजा सुनाई गई। 25 जुर्माना भी भरना पड़ा। जैसे ही सजा काटकर लौटे, फिर भारत छोड़ो आंदोलन में पकड़े गए। वर्ष 1942 में चार दिसंबर को अंग्रेजों ने 100 रुपया जुर्माने के साथ एक साल की कड़ी कैद दी। सर्वोदय विचारों पर पुस्तक लिखने वाले हरदम सिंह को स्वतंत्रता के उपरांत कांग्रेस की पहली प्रदेश कमेटी में रखा गया था। कुछ वक्त वे अवैतनिक मजिस्ट्रेट भी रहे। वह इमरजेंसी में जेल गए थे। उन्हीं के साथी हैड मास्टर हुकुम सिंह पुत्र होशियार सिंह की रगों में आजादी का लहू हिलोरे लेता था। ब्रिटिश हुकूमत ने दो बार उन्हें कठोर कारावास की सजा दी, जिसमें 29 मार्च, 1941 तथा चार फरवरी, 1943 को क्रमश: एक-एक साल की कैद तथा 60 और 100 रुपया जुर्माना लगा था। अंग्रेजों ने तीन बार उनके घर की कुर्की की थी।
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सेनानियों से गौरवान्वित हुआ गांव
भोपा। हुकुम सिंह के पुत्र धीर सिंह बताते है कि व्यक्तिगत सत्याग्रह एवं भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तारी के बाद उनके पिता शाहजहांपुर और बरेली जेल में एक-एक साल रहे थे। जुर्माना अदा किया, कोड़े सहे, तब रिहाई हुई। वर्ष 1964 में उनका निधन हुआ, जबकि मां छोटी देवी डेढ़ साल पहले चल बसी हैं। पौत्र अंकित तथा संकेत पुलिस में है। स्वाधीनता सेनानियों के त्याग से गांव गौरवांवित है। उधर, हरदम सिंह का पौत्र हिमांशु पुत्र संत कुमार सेना में देश सेवा कर रहा है।
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टीकम ने दिल्ली जेल में सही थीं यातनाएं
भोपा। स्वतंत्रता सेनानी टीकम सिंह सैनी ने बेहड़ा थ्रू का मान बढ़ाया। लक्ष्मण सिंह के इस पुत्र ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में वर्ष 1932 में दिल्ली जेल में यातनाएं सही। 26 मार्च, 1941 को एक साल कैद की सजा मिली। 50 रुपये जुर्माना नहीं देने पर तीन माह की सजा अलग से भुगती थी। गांव के अतर सिंह पुत्र सुखबीर सिंह ने भी 31 मई, 1932 को डेढ़ माह और 20 रुपया जुर्माना की सजा काटी थी।
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