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देहरादून के लिए ... रामपुर तिराहा कांड : सीबीआई ने दाखिल की छह राज्यों के मामलों की रूलिंग

Wed, 20 Mar 2024 01:06 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मुजफ्फरनगर
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- 120 पेज पर लिखा गया रामपुर तिराहा कांड का फैसला
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- अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या सात ने सुनाई थी सजा

फोटो समेत
अमर उजाला ब्यूरो

मुजफ्फरनगर। देश को झकझोर कर रख देने वाले रामपुर तिराहा कांड का फैसला न्यायालय ने 120 पेज पर लिखा है। तीन दशक पुराने मामले में पुलिस की बर्बरता और सीबीआई की जांच को भी गवाहों ने अदालत में विस्तार से बयान किया। छह राज्यों में इससे पहले हुए निर्णयों की रूलिंग भी सीबीआई ने अदालत में दाखिल की थी।
हाईकोर्ट ने 10 फरवरी 2023 को अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या-7 के पीठासीन अधिकारी शक्ति सिंह को सुनवाई के लिए अधिकृत किया था। इसके बाद सुनवाई में तेजी आई। फैसले में धारा 228 ए के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए पीड़िता का नाम नहीं दिया गया। 25 जनवरी 1994 को सीबीआई ने देहरादून में यह मामला दर्ज किया था। हाईकोर्ट ने 12 जनवरी 1995 को सीबीआई को विवेचना के आदेश दिए थे।
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अभियोजन ने मामलों का समर्थन भी लिया
मुजफ्फरनगर। अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में फूल सिंह बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश 2022, स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम एनके 2000, स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम चंद्रप्रकाश केवलचंद जैन1990, राम सिंह उर्फ छज्जू राम बनाम स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश, संतोष मूल्या बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटका और छोटकऊ बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश का हवाला दिया गया।

सिपाहियों को यह सुनाई गई सजा
रामपुर तिराहा कांड में सामूहिक दुष्कर्म, लूट और छेड़छाड़ के दोषी पीएसी के सिपाही रहे मिलाप सिंह और वीरेंद्र प्रताप सिंह को धारा 376 (2) (जी) में आजीवन कारावास और 25 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। धारा 392 में सात साल का कठोर कारावास और 10 हजार रुपये अर्थदंड, छेड़छाड़ की धारा 354 में दो साल कारावास और 10 हजार रुपये अर्थदंड और धारा 509 में एक साल का कारावास और पांच हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। दोनों दोषियों पर कुल अर्थदंड एक लाख रुपये लगाया गया है।

यह था मामला

एक अक्तूबर, 1994 की रात अलग राज्य की मांग के लिए देहरादून से बसों में सवार होकर आंदोलनकारी दिल्ली के लिए निकले थे। इनमें महिला आंदोलनकारी भी शामिल थीं। रात करीब एक बजे रामपुर तिराहा पर बस रूकवा ली। दोनों दोषियों ने बस में चढ़कर महिला आंदोलनकारी के साथ छेड़खानी और दुष्कर्म किया।पीड़िता से सोने की चेन और एक हजार रुपये भी लूट लिए थे। आंदोलनकारियों पर मुकदमे दर्ज किए गए। उत्तराखंड संघर्ष समिति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद 25 जनवरी 1995 को सीबीआई ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमें दर्ज किए थे।

उत्तराखंड के सुधाकर दत्त थे पहले गवाह
अदालत में गवाही शुरू हुई तो आंदोलन में शामिल सुधाकर दत्त पहले गवाह थे। उन्होंने अदालत में पुलिस की बर्बरता की कहानी बयान की। साथ ही यह भी कहा कि मुजफ्फरनगर के लोगों ने हमें बचाने का काम किया था।
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भट्ठे पर ली गई थी शरण
अदालत में एक साक्षी ने गवाही दी कि ढाबे पर आंदोलनकारी खाना खाने लगे। इसी दौरान दाल के पतीले पर पत्थर आकर गिरा। दूसरा पत्थर गिरते ही लाइट बुझ गई। इसके बाद हम पीछे भट्ठे पर चले गए और वहीं से घटना देखते रहे। पुलिसबल शीशे तोड़ रहे थे और वाहनों में रखा सामान भी निकाल रहे थे। जिस बस में महिला सवार थी, उसे सिपाही जबरन ले जा रह था, जबकि महिला आंदोलनकारी इसका विरोध कर रही थीं।
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