-नई पहल: आवारा घूमते पशुओं को खेती-बाड़ी में उपयोगी बनाते चरथावल के लघु किसान
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चरथावल खेतों में आवारा घूमते पशुओं को लेकर हो-हल्ला मचता है। लॉकडाउन के दौरान एक नई पहल हो रही है। बेसहारा घूमने वाले गोवंश को कामगारों और ग्रामीणों ने पालतू बनाकर खेती-किसानी में उपयोग करना शुरू कर दिया है। यह प्रयोग गोवंश के संरक्षण के साथ किसान और मजदूरों की आजीविका का साधन बन गया है।
किसानों की जीवनरेखा मानी जाने वाली फसल गन्ने की बुवाई और जुताई का कार्य चल रहा है। दूधली, न्यामू, छिमाऊ आदि आसपास गांवों में खेतों में जुताई करने का अंदाज बदला है। दूधली के लक्ष्मण के परिवार की आर्थिक स्थिति दयनीय है।
जमीन बिक जाने के बाद उन्होंने बेसहारा गोवंश को पालतू बनाकर आजीविका का जरिया बना लिया। गायों की सेवा कर दूध बेचता है। हिमाचल प्रदेश में फैक्टरी में काम ठप होने के बाद उनका बेटा राहुल और लक्ष्मण गांव आ गए हैं।
लॉकडाउन में दोनों पिता के साथ किसानों के खेतों में बैलों से जुताई में लग गए हैं। गांव के राजकुमार, संदीप आदि से आवारा गोवंश को हल में लगाकर जुताई का जरिया बना लिया। गांव के शहजाद अली का बेटा आजम हरिद्वार में रेडीमेड कपड़ों का धंधा करता था। बंदिश के कारण फिलहाल घर आकर पिता के साथ खेतों की जुताई कर रहा है।
उधर, न्यामू के पहाड़ों में काम करने वाले सैकड़ों नौजवान घर आ गए है। किसान सुधीर त्यागी, उदय पुंडीर, मुकेश कुमार छिमाऊ बताते हैं कि ईख बुवाई और जुताई मंदी और सुलभ हो गई है। 150 प्रति बीघा जुताई पर मजदूरों मिल रहे हैं। वहीं, पिछले वर्ष गेहूं कटाई को मजदूर 50 किलो प्रति बीघा पर नहीं मिलते थे। इस बार 30 किलो बीघा पर कटाई करने वालों की लाइन है।