मुजफ्फरनगर और शामली केबीच बसे हैं शौरम, मुंडभर, भौराकलां, भौराखुर्द, कुटबा कुटबी आदि बालियान खाप केचौरासी गांव। सिसौली इनमें प्रमुख है। इसे लोग अब टिकैत की सिसौली केनाम से ही जानते हैं। बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र में आने वाला ये क्षेत्र कभी राजनेताओं केमाथे पर पसीना ला दिया करता था।
किसानों की राजधानी कहे जाने वाले सिसौली में जहां कभी प्रदेश और देश की राजनीति तय होती थी, अब गलियां सूनीं हैं। गांव में चौपाल तो लगती है, लेकिन चर्चा के लिए बस स्थानीय मुद्दे ही हैं। किसान बात करते हैं गन्ना भुगतान की और बिजली की। ये वही मुद्दे हैं जिनमें 1987 में किसानों ने उठाया और देश को अपनी ताकत की पहचान कराई। किसानों को एकजुट करने वाले टिकैत अब भी लोगों की जुबान पर है। बात सिसौली केलोगों से करे, मुंडभर, शौरम या भौराकलां के लोगों से। पहली बात टिकैत केजमाने की ही होती है।
महेंद्र सिंह टिकैत ने भाकियू के माध्यम से किसानोें के आंदोलन की अगुवाई करते हुए बेपनाह मकबूलियत हासिल की और किसानों के रहनुमा केतौर पर टिकैत शब्द हर किसान की जुबान पर रटा जाने लगा। सिसौली का नाम विधानसभा और संसद में गूंजा। भले ही भाकियू अराजनैतिक रही हो लेकिन पार्टी टिकट देते हुए सिसौली से रायशुमारी करना नहीं भूलती थी।
किसानों की राजधानी क्षेत्र (उस समय खतौली विधानसभा क्षेत्र और अब बुढ़ाना) में पार्टी उसी का चुनाव लड़ाना पसंद करती थी, जो सिसौली को पसंद होता था। भाकियू केपंचायत स्थल किसान भवन से जो आवाज आती थी, लोग उसी तरफ घूम जाते थे, लेकिन ये बातें अब पुरानी हो चुकी हैं। किसान भवन में फिलहाल मासिंक पंचायत भी बंद है। भाकियू अध्यक्ष नरेश टिकैत कहते हैं कि किसान अंतर आत्मा की आवाज पर वोट देंगे, भाकियू किसी का समर्थन नहीं करती।
अमर उजाला की टीम ने सिसौली में लोगों की राय जानी तो किसानों को एकजुट करने वाली बालियान खाप केवोट भी बंट चुके हैं। लगभग 12 हजार मतदाता वाले सिसौली गांव में मुद्दे बेशक एक हैं, लेकिन लोगों की राय अलग। कभी लखनऊ तक सीधी बस सेवा से जुडे़ सिसौली में अब एक भी बस दिखाई नहीं देती। परिवहन और शिक्षा यहां की समस्या है। गांव में लड़कियों केलिए कालेज तो बन गया, लेकिन लड़के पढ़ने केलिए बड़ौत, कांधला, शामली और मुजफ्फरनगर तक जाते हैं। इलाज केलिए भी लोग शामली या मुजफ्फरनगर पर निर्भर हैं।
गांव में प्रचार गाड़ी दिखी, लेकिन बस उनमें नजर आए कार्यकर्ता। नई आबादी में पहुंचे तो कुछ किसान हुक्का गुडगुड़ा रहे थे। एक किसान गोपी कहते है यहां एक आवाज पर लाखों लोग इकट्ठे हो जाते हैं। चौधरी बड़े टाइट थे। लोग रिस्क नहीं लेते, वोट किसी को भी दें, चौधरी साहब केखिलाफ मुकदमा लड़ने वाले को सिसौली से समर्थन नहीं मिलेगा। पूछने पर इतना ही कहते हैं कि किसान भवन से आदेश जारी हो तो हम मानेंगे, लेकिन अब कोई आदेश जारी नहीं होता।
देशपाल सिंह, हुसैन आलम कहते है किसान और व्यापारी की समस्या हैं। अशोक कुमार और मांगेराम बताते हैं कि जरूरत है पहले जैसी एकता की। रामपाल और सोमपाल जिक्र करते हैं समस्याओं केसमाधान करने वाली सरकार की। कहते हैं जो भी आता है वोट मांगने ही आता है, उसकेबाद गायब्र्र।
सिसौली केही एक मोहल्ले पट्टी सूंडियां के एक घेर में कुछ लोग चुनावी चर्चा में व्यस्त थे। 52 साल केकिसान विजेंद्र फौजी साफ कहते हैं कि पहले मंत्री, मुख्यमंत्री म्हारै धोरे काम पूछ्छन आवै थे, इब हम हाथ जोड़ते फिरै। वोट मांगने ही आवै इब भी। महक सिंह कहते हैं मुद्दे क्या हौवे हमे ना पता, लेकिन सरकार ने काम कोई खास ना किया। पांच साल में गन्ने पर पांच रुपये बढ़ाए।
सिसौली से दो किमी दूर मुंडभर गांव में भी ओमप्रकाश कहते हैं जब किसान भवन से वोट डालने की बात बाहर आती थी तो वो जमाना ही कुछ और था। अब बात मर्जी की है, लेकिन किसान एकजुट नहीं। सौराज आजाद सिंह, जितेंद्र सिंह समस्या की बात करते हैं, साथ ही बोलते हैं कि किसान तभी खुश रह सकता है जब एकजुट हो। बंटकर किसानों को कुछ हासिल नहीं होगा।
भौरांखुर्द गांव के विक्रम सिंह कहते हैं कि पहले समस्या होती तो कब का समाधान हो गया होता। अब तो कोई पूछने ही नहीं आता। वोट तो काम करने वाले का दिया जाता है। 8 हजार मतदाता वाले शौरम गांव में सर्व खाप के मंत्री सुभाष बालियान खराब कानून व्यवस्था की बात करते हैं। राजबीर सिंह सड़क और परिवहन की समस्या गिनाते हैं। केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान कुटबा कुटबी केरहने वाले हैं, उनका प्रभाव भी इन गांवों मे दिखाई देता है।