फिरंगी दौर में अंग्रेजों के जुल्म के सामने कभी नहीं झुके हसन
चरथावल। फिरंगी दौर में आजाद हिंद फौज के वीर सेनानी अमजद हसन पर फिरंगियों की जुल्म की दास्तां आज भी चरथावल के बाशिंदों में देशभक्ति का जोश बढ़ाती है। सुभाष चंद बोस के सपनों को लेकर अमर गीत चल चल रे नौजवान, रुकना तेरा नाम नहीं..अमर गाथा और फिरंगियों के दमन चक्र के खिलाफ उनका संघर्ष अमिट है।
आजाद हिंद फौज में साहस और पराक्रम की इबारत लिखने वाले अमजद हसन का जन्म काजी अहमद हसन के घर हुआ था। चरथावल कस्बे के मोहल्ला तगायान मुस्लिम में 23 जनवरी 1926 को जन्मे हसन को बचपन से देशभक्ति का जज्बा भरा था। युवावस्था में देश के क्रांतिकारियों पर किए जा अंग्रेजों के कहर ने उनमें देशप्रेम का जज्बा बढ़ा। खून में बसी माटी की महक से वह नेताजी के कदमों की छांव बन गए। जबलपुर, पुणे और मुंबई में आजाद हिंद फौज को प्रशिक्षित करने के बाद उन्हें मिश्र भेजा गया। 15 महीने तक भारतीय फौज में सिपाही रहे। क्रांति के पहले नायक मंगल पांडे की तर्ज पर हसन ने सेना से विद्रोह कर नेताजी का नेतृत्व हासिल कर लिया था। अंग्रेजों को उनकी बगावत सहन नहीं हुई और गिरफ्तार कर लिए गए। इंग्लैंड मिलिट्री में उन्हें आठ महीने की यातना भरी कैद मिली और दो माह काल कोठरी में बीते। उन्हें वर्ष 1946 में समुद्री जहाज से भारत लाया जा रहा था, तब तब यात्रा के दौरान ब्रिटिश हुकूमत में सिपाहियों ने उनके पैर में गोली मार दी थी। उनके कुटुंबी लोकतंत्र सेनानी चरथावल निवासी डा. मुस्तफा उनके संस्मरण सुनाते हुए कहते हैं कि एक महीने तक उन्होंने आम के पत्ते खाकर वक्त गुजारा था। भारत लाकर उन्हें बहादुरगढ़ जेल में डाला गया। चौधरी विजय त्यागी उनकी यातनाओं को याद कर सिहर उठते हैं। कहते हैं कि लाल किले में उन पर मुकदमा चला। कई महीने बाद जेल से छूटकर चरथावल आए, तो उनकी मां का इंतकाल हो चुका था। वर्ष 1950 में चरथावल का मकान बेचकर वह बच्चों को साथ लेकर मेेरठ जाकर बस गए। उनका परिवार वहीं रहता है। वर्ष 2003 के नवंबर में उनका इंतकाल हो गया था।
गुलामी दौर में यातनाओं को नहीं भूलते परिजन
चरथावल। कस्बे में रह रहे उनके परिजन साजिद हसन और मुजाहिद हसन बताते हैं कि उन्होंने बचपन में वह हमेशा देश सेवा के लिए फौज में भर्ती होने के लिए प्रेरित करते थे। कस्बे के तनवीर एडवोकेट देश को फिरंगी दौर में देश को आजाद कराने वाले वीर बलिदानी को अपनी श्रद्धांजलि देते कहते हैं कि अमजद तुझे सलाम..नि:स्वार्थ भाव के धनी हसन को राजनीति का मोह कभी नहीं भाया।