- बधाई कलां के अरविंद ट्रांसप्लांट विधि के साथ सहफसली खेती का ले रहें फायदा
- बड़चिप तरीके से पौध लगाकर कम लागत में पैदावार करने में माहिर है लुहारी के लाजपत
संवाद न्यूज एजेंसी
चरथावल। नए परिवेश में कम लागत में बेहतर उत्पादन करने में किसानों का रुख बढ़ रहा है। तकनीकी खेती करने के माहिर किसानों ने क्षेत्र के लिए मिसाल बने है। बधाई कलां के प्रगतिशील किसान अरविंद मलिक ने ट्रांसप्लांट विधि और लुहारी खुर्द के लाजपत सैनी पूरी जमीन में बड़चिप विधि से गन्ने की नई प्रजाति को रोपित किया है। दोनों किसानों का मानना है बदलते तौर तरीकों से सहफसली खेती के साथ नया बीज रोपित करने से बेहतर उत्पादन किया जा सकता है।
खेती में नए प्रयोग करना अरविंद मलिक की आदत बन चुका है। वे उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद में रोहाना गन्ना समिति के कृषक के रूप में पंजीकृत किसान है। उन्होंने खुद बीज तैयार कराकर नौ बीघा में ट्रांसप्लांट विधि से गन्ने की बुवाई की है। पिछले महीने इतनी खेती में पौध लगाई जा चुकी है। इस बार सहफसली के तौर पर चना और अलसी का बीज रोपित किया। पहली बार ईख की नई वैरायटी 14201, 15223, 13233 188 और 239 को एक ही खेत में बोया है। ताकि उसके फुटाक, जमाव और लंबाई का मालूम चले सके। सरसों कटने के बाद मार्च में बाकी 30 बीघा भूमि में ईख की बुवाई में मूंग की सहफसली खेती करेंगे।
सहफसली की आमदनी में लेते है गन्ने की लागत
अरविंद मलिक कहते है सहफसली खेती में एक बीघा में एक क्विंटल चना और 20 किलो अलसी का उत्पादन का अनुमान है। साथ में 80-100 क्विंटल गन्ने की पैदावार होती है। इसमें गन्ने की बुवाई और कटाई तक की लागत निकल जाती है। गन्ना बीज और पानी की खपत करीब 75 फीसदी घट जाती है। पेस्टीसाइड में 50 प्रतिशत कम खर्च आता है। साथ ही सहफसली से हरी खाद खेतों की उर्वरता शक्ति बढ़ाती हैं। इस विधि से गन्ने की पेड़ी भी कई वर्षों तक ले सकते हैं।
ईख की पौध के साथ चारा और खीरा लगाया
लुहारी खुर्द के किसान लाजपत सैनी अरसे से खेती में नए तकनीकी अपनाने का शौक रखते है। वह पूरी 48 बीघा जमीन में बड़चिप विधि से पौध तैयार करते है। खेतों में लगाकर कम लागत में बेहतर पैदावार करते है। ईख की पौध के साथ चारा और खीरा लगाया है। कहते है कि वे बेटे सोनू के साथ खेतीबाड़ी पर ध्यान केंद्रित रखते है। मानना है कि इसमें खेत में पौध के बीच गैप नहीं रहता। कम लागत में पैदावार अधिक होती है। अमूमन ईख की बुवाई में एक बीघा में पांच क्विंटल बीज लगता है। बड़चिप विधि से मात्र 11 से 12 किलो प्रति बीघा खर्च आता है। एक बीघा की पौध मात्र 32 वर्गफीट जमीन में तैयार कर लेते है। सिंचित करने में पानी की खपत कम है। पौधों की जड़ तक पानी पहुंचता है।
बधाई कलां में सहफसली के साथ रोपित की गई ईख की पौधों को निराई करती महिलाएं
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