मुजफ्फरनगर। जिले का लोहा उद्योग एक साल से मंदी की मार झेल रहा है। जनपद में लगभग 50 लोहा फैक्टरी हैं, जिनमें एक लाख टन लोहे का प्रतिमाह उत्पादन होता है। इससे हर माह 500 करोड़ रुपये का व्यापार हो रहा है। लोहा उद्योग को उम्मीद है कि बरसात के बाद मंदी की मार से उबर पाएंगे। इतना ही नहीं बिजली की बढ़ती दरें उद्योग पर भारी पड़ रही हैं। उद्यमियों का कहना है कि उत्तराखंड और दिल्ली की तरह सस्ते दाम पर बिजली मिलनी चाहिए।
जनपद की पहचान लंबे समय से लोहा उद्योग से रही है। इस समय नौ बड़ी सरिया मिलों सहित लोहे की 50 फैक्टरियां हैं, जिनमें एक माह में लगभग एक लाख टन सरिया तैयार हो रहा है। एक माह में यह उद्योग 500 करोड़ का व्यापार करता है और इन मिलों में लगभग 50 हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है।
लोहा उद्योग की प्रतिस्पर्धा उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली आदि की फैक्टरियों से है। यहां के उद्यमियों का कहना है कि दूसरे राज्यों में बिजली के दाम कम है उनकी लागत कम आती है। दूसरे मुजफ्फरनगर एनसीआर में शामिल हो गया है और यहां कोयले का उपयोग बंद हो गया है। कोयला मंदा पड़ता है जबकि दूसरे ईंधन महंगे हैं। इससे भी यहां लोहा तैयार करने में खर्च बढ़ गया है। इसके बाद भी हम प्रतिस्पर्धा में खड़े हैं। बीते एक साल से लगातार मंदी की मार झेल रहे थे। बीते दो माह से थोड़ी मांग बढ़ने बढने से ऐसा लग रहा है कि बरसात के बाद घाटे से बाहर आ जाएंगे।
बिजली महंगी, कोयले पर प्रतिबंध: गोयल
जिले के प्रमुख लोहा उद्यमी सतीश गोयल का कहना है कि हमारी सीमा पांच राज्यों से मिली है। पांचों में बिजली के दाम हमसे कम है। दूसरे एनसीआर में शामिल होने से मुजफ्फरनगर मेंं कोयले का प्रयोग बंद हो गया है। हमारा उत्पादन का खर्च अन्य राज्यों से अधिक है। इसके चलते प्रतिस्पर्धा में खड़े रहना हमारे लिए बड़ी चुनौती है। उम्मीद है बरसात के बाद लोहा उद्योग रफ्तार पकड़ेगा।
मंदी की मार ही झेल रहे: संजय
सरिया मिल मालिक संजय जैन का कहना है कि अधिक गर्मी होने के कारण निर्माण कार्य प्रभावित हुए हैं। अब बरसात शुरू होने वाली है इसमें भी मांग कम रहेगी। एक साल से लोहा उद्योग मंदी की मार झेल रहा है। उम्मीद है आने वाला समय बेहतर होगा।