मुजफ्फरनगर/चरथावल। मुस्लिमों के पारंपरिक त्योहार ईद उल अजहा पर पशुओं की मंडियां बंद होने से बकरों का बाजार ठप हो गया है। दिल्ली समेत बड़े शहरों पर कोरोना का खतरा मंडराने से पशु कारोबारी निराश है। उधर, आर्थिक मंदी और कोरोना की बंदिश में बकरीद पर बकरों की डिमांड घट गई है। इस साल दूसरे प्रांतों में बकरे और पशु बेचने वाले कारोबारियों को तगड़ा झटका लगा है। अमर उजाला की बकरीद के त्योहार पर पड़ताल पर रिपोर्ट:
कोरोना महामारी ने हर त्योहार का रंग फीका कर दिया है। बचाव के लिए लोगों को अब पारंपरिक त्योहारों की रस्म अदायगी तक सीमित होना पड़ रहा है। ईदुल फितर के बाद ईद उल अजहा का त्योहार पर अकीकदमंदों के सामने बचाव के साथ आर्थिक मंदी आड़े आ रही है। बाहर प्रांतों में काम करने वाले श्रमिकों घर लौट आए है। उन्हें रोजाना काम तलाशना पड़ रहा है। यही वजह हैं बकरीद पर कुर्बानी के बकरों का इंतजाम हर व्यक्ति के बस से बाहर है।
चरथावल के शेखजादगान गर्बी निवासी पशु व्यापारी पूर्व सभासद गुलफाम बताते हैं कि हर साल बाहरी मंडियों में करीब 10 गाड़ियां बकरे और अन्य पशु बेच देते थे। इस बार स्थानीय मंडियां शहर बाईपास, गंगोह, दभेड़ी, बड़ौत आदि बंद होने से बकरों का इंतजाम नहीं किया और दिल्ली समेत अधिकांश मंडियां बंद होने से कारोबार ठप हो गया है। पिछले वर्ष उन्होंने सवा लाख तक का बकरा दिल्ली की मंडी में बेचा था।
कुल्हेड़ी के वाशिंदे पूर्व जिला पंचायत सदस्य सलीम कुरैशी पशुओं की खरीद फरोख्त के बड़े व्यापारी है। बकरीद पर दिल्ली के अलावा मेरठ और गाजियाबाद तक बकरों की दर्जनों गाड़ियां बेचते थे। कई महीने पहले हीे स्थानीय मंडियों और गांव देहात में पालने वालो से बकरों का बंदोबस्त कर लिया जाता था। लेकिन इस बार सब धंधा चौपट हो गया है। विभिन्न वैरायटी देखकर लोग महंगे बकरे खरीदने से गुरेज नहीं करते थे। पिछले वर्ष उन्होंने सवा दो लाख का बकरा दिल्ली बेचा था।
कस्बे के गुलजार बताते हैं कि पिछले साल तोतापरी वैरायटी का बकरा 30 हजार तक दिल्ली की मंडी में बिकता था। लेकिन इस बार 15 हजार का ग्राहक भी नहीं मिल रहा। बकरीद पर बकरों में बरबरा, देेशी और अंबरसरी आदि किस्म बकरों की मांग हर वर्ष खूब रहती थी। लेकिन इस बार बाजार के आबाद नहीं होने से मायूसी है।
जमीयत उलमा हिंद के जिलाध्यक्ष एवं चरथावल की जामा मस्जिद के सदर मौलवी कासिम कहते है कि किसानों का गन्ना भुगतान न होना, रोजगार का संकट और कोरोना की बंदिश में बकरों की खरीदारी कम होना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग जकात के मुताबिक कुर्बानी करेंगे। लेकिन बकरीद का त्योहार आम व्यक्ति के लिए औपचारिकता बनकर रह गया है। लोकल स्तर पर पुलिस की पाबंदी बकरों की खुली बिक्री करने में सामने आ रही है।